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इंटरनेट है तो आजादी जीतेगी

चेयरमैन माओ कहा करते थे, ‘एक कम्युनिस्ट के तौर पर हम सत्ता बंदूक की ताकत से हासिल करते हैं और उसे कलम की ताकत से बनाए रखते हैं।’ आप देख सकते हैं कि प्रचार और विचारधारा पर नियंत्रण तानाशाही वाली व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण काम होता है। इंटरनेट के आने से पहले चीन में सभी लोग या तो टेलीविजन देखते थे या फिर ‘पीपुल्स डेली’ अखबार को पढ़ते थे। वे बड़े ध्यान से शब्दों में छिपी इबारत को पढ़ने की कोशिश करते और यह अनुमान लगाते कि दरअसल हुआ क्या था। लेकिन अब यह बदल गया है। अब अखबार घटनाओं के बारे में चर्चा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसके पहले कि वह चर्चा छपे, हर कोई इस बारे में इंटरनेट पर बातें कर रहा होता है।

मुझे अब भी लगता है कि गोर्बाच्योव ने रूस में ग्लासनोस्त की जो क्रांति की थी, वह ज्यादा महत्वपूर्ण थी। खुलापन और पारदर्शिता ही वह तरीका है, जिससे गलत तरह की ताकतों पर रोक लगाई जा सकती है। चीन के लोगों के पास अपनी राय रखने का अधिकार कभी नहीं रहा। हालांकि वहां के संविधान में यही कहा गया है कि आप अपनी राय रख सकते हैं, लेकिन हकीकत में यह बहुत खतरनाक होता है। पश्चिम में लोग सोचते हैं कि वे इस अधिकार के साथ ही पैदा हुए हैं। हमारे यहां यह अधिकार सरकार ने दिया है, लेकिन व्यवहार में कहीं नहीं दिखाई देता।

हालांकि चीन में सुधार हुए हैं और चीजें खुल रही हैं। लेकिन इस खुलने का अर्थ खुलापन नहीं है। इसका सिर्फ इतना अर्थ है कि पश्चिम के लिए दरवाजे खोले जा रहे हैं। यह व्यवहार का मामला है, विचार का नहीं। शुरू में किसी ने भी, यहां तक कि पश्चिम ने भी नहीं सोचा था कि इंटरनेट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए इतना कुछ करेगा। किसी को नहीं पता था कि सोशल मीडिया इस तरह विकसित होगा। सिर्फ इतना पता था कि यह बहुत कुशल है, तेज है और संचार का ताकतवर माध्यम है।

हमें इंटरनेट मिल गया, इसलिए हम ब्लॉग लिख सकते थे। अब तो माइक्रो ब्लॉग भी लिख सकते हैं। इससे लोग विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं, जिसकी वजह से आजादी का एक भाव पैदा हुआ है। यह ठीक है कि इसमें तरह-तरह की चीजें हैं। कुछ लोग बताते हैं कि उन्होंने नाश्ते में क्या लिया था, तो कुछ लोग खबरों के बारे में गंभीर चर्चा करते हैं। लेकिन दोनों ही तरह से लोग यह सीखते हैं कि अपने अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया जाए। यह अद्भुत क्षण है, जब लोग ठंडी हवा के झोंके महसूस कर रहे हैं। इंटरनेट एक जंगल है, जिसके अपने खेल हैं, अपनी भाषा है, अपने तौर-तरीके हैं, जिनके जरिये हम अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

लेकिन चीन सरकार नियंत्रण नहीं छोड़ सकती। उसने इंटरनेट के बड़े प्लेटफॉर्म फेसबुक, ट्विटर सब पर रोक लगा दी है, क्योंकि वह मुक्त चर्चा से डरती है। सरकार सूचनाओं को डिलीट कर देती है। सरकारी कंप्यूटर में बस एक बटन है- डिलीट। लेकिन यह सेंसरशिप काम नहीं करती। आधी रात को वे आपके कमरे में घुसकर आपको पकड़ सकते हैं। आपको काला नकाब पहनाकर पूछताछ के लिए किसी खुफिया ठिकाने पर ले जा सकते हैं। वे लोगों को, आपके परिवार को धमकाते हैं, ‘तुम्हारे बच्चों को काम नहीं मिलेगा।’

साथ ही सरकार यह भी बात करती है कि राष्ट्रीय संस्कृति को किस तरह मजबूत और रचनात्मक बनाया जाए। अगर किसी के पास जानकारी चुनने का अधिकार नहीं हो, किसी भी विचारधारा से जुड़ने और अपनी कल्पनाशीलता से अपना निजी चरित्र विकसित करने की स्वतंत्रता उसे नहीं हो, तो वह शख्स भला कैसे रचनात्मक हो सकता है? अगर आप व्यक्तित्व निखारने, स्वतंत्र होकर सोचने, जोखिम लेने और नतीजों को भुगतने के लिए तैयार रहने के हर मूल्य के खिलाफ हैं, तो आप किस तरह की रचनात्मकता की उम्मीद कर रहे हैं? हर कोई आईफोन चाहता है, लेकिन चीन में आईफोन डिजाइन करना असंभव है, क्योंकि यह सिर्फ एक उत्पाद नहीं है, यह इंसान की फितरत की एक समझ है।

सेंसरशिप कहती है, ‘आखिरी बात मेरी ही होगी। आप जो भी कहें, पर निष्कर्ष मेरा ही होगा।’ लेकिन इंटरनेट एक पेड़ की तरह है, जो लगातार बढ़ रहा है। इसमें आखिरी शब्द हमेशा लोगों का ही होता है, भले ही किसी की आवाज कितनी भी कमजोर क्यों न हो। यह ताकत फुसफुसाहटों की वजह से बिखर सकती है।

जब मैं जवान था, मैं बागी किस्म का हो गया था। मेरे बाल लंबे हो गए थे, मैं उन्हें कटवाने जा रहा था कि मेरे माता-पिता ने कहा- बाल कटवाओ, काफी लंबे हो गए हैं। मैंने तय किया कि मैं इन्हें ऐसे ही रहने दूंगा और वे बहुत लंबे हो गए। नौजवान लोगों की पीढ़ी तो ऐसी ही होती है। उनके मूल्य उनके माता-पिता के मूल्यों से अलग होते हैं। मां-बाप तो सिर्फ यही सोचते हैं कि कैसे जिया जाए और पैसे कमाए जाएं।

नियंत्रण के मामले में चीन काफी सफल लग सकता है, लेकिन इसने सिर्फ जलस्तर को बढ़ाया ही है। यह बांध बनाने की तरह है। जब वह सोचता है कि और पानी आएगा, तो वह बांध की ऊंचाई बढ़ा देता है। लेकिन जितना भी पानी था, एक-एक बूंद अब भी वहीं है। उन्हें पता नहीं है कि इसके दबाव को कैसे कम किया जाए। इसे इस तरह बनाया गया कि इसकी देखरेख व मरम्मत होती रहे और समस्या अगली पीढ़ी को सौंप दी जाए। अभी वह समय नहीं आया, जब यह टूट जाएगा। इसी वजह से कई दूसरे देश इसकी तकनीक और तरीके की तारीफ करते हैं। लेकिन आगे चलकर इन देशों के नेता भी समझ जाएंगे कि इंटरनेट पर नियंत्रण करना तब तक संभव नहीं, जब तक इसे पूरी तरह बंद ही न कर दिया जाए, और बंद किया, तो उनके नतीजे भी वे भुगत नहीं सकेंगे। इंटरनेट पर नियंत्रण नहीं हो सकता। और अगर इंटरनेट पर नियंत्रण नहीं कायम हो सकता, तो आजादी जीतेगी ही। यह बहुत आसान-सी बात है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

द गाजिर्यन से साभार

 

 

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