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बयान के इंतजार में भटकती आत्मा

ये जो अपने इर्द-गिर्द की दुनिया है, उसमें घटने वाली वारदात लघु चेतस और छोटी समझदानी वालों को भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के पर्याप्त अवसर देती है। एक संत के अनुसार, सकल (चैनल रूपी) पदारथ है जग माही वाली सिचुएशन। करमहीन नरों को कौन पूछता है? ऐसे में, ईर्ष्या होती है टीवी स्क्रीन पर अवतरित उन चेहरों से, जिनसे मीडिया‘कर’ किसी घटना या दुर्घटना के बाद माइक मुंह में ठूंस पूछते हैं, कैसा लग रहा है? इनडोर का सीन अलग। एक एंकर, ‘आचार्य’ और चार-पांच चुनिंदा ‘शंकराचार्य।’ टीवी स्क्रीन पर शास्त्रर्थ। बोले तो तू-तू, मैं-मैं।
आदतन उदास थे वह। पिछले दिनों ढेरन मौके हाथ से निकल गए प्रतिक्रिया व्यक्त करने के। कोई भी नहीं फटका उनके पास। बीते दिनों के चुनाव परिणाम में हाथ की ‘सफाई’, कमल के साथ-साथ हाथी के कीचड़ में जाने, बजट वाले दिन महाप्रभु के सौवें शतक की धूम के बाद वह भीड़-भाड़ वाले इलाके से लेकर मॉल तक में घूम आए, लेकिन एक भी माइक उनके ‘मुंह नहीं लगा’। वैचारिक अभिव्यक्ति के अधिकार से वंचित उनकी आतंरिक पीड़ा वह कवि-मन ही समझ सकता था, जो काव्य पाठ करना चाहे और कवि-सम्मलेन रद्द कर दिया जाए। एक काव्यात्मक घुटन महसूस कर रहे थे वो। क्यों नहीं पूछा किसी ने कि भगवान के सौवें शतक पर कैसा लगा? प्रोणोब दा के बजट पर क्या प्रतिक्रिया है.. मोमता दी केनो राग कोरटेन.. माइकधारी की खोज में धार्मिकता के साथ मन भटकता रह गया।

चित्त की शांति हेतु दिलासा भाव में उनको सांत्वना देते हुए मैंने कहा, हाशिये पर तो वे भद्र-लोग भी चले गए, जो भरपूर फुटेज खा रहे थे। पहले रोज नजर आते थे, अब नहीं आते ‘गरीब’- खाने पे जूठन गिराने। बासी हो रहा है उन गरीबों का सत्कार.. दिग्भ्रमित अग्रज भी शांत। न टीवी दर्शन, न अखबारों में तस्वीर। फिलहाल मंथन चालू आहे। कोई लौटा दे उनके बीते हुए दिन। हतोत्साहित नहीं हैं वह। कदाचित उनसे इस अंतरराष्ट्रीय घटना पर ही बयान ले लिया जाए कि अमेरिकी हवाई अड्डे पर किंग खान को बारंबार ‘प्रेशान’ किए जाने पर उनकी प्रतिक्रिया क्या है..।

 

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