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पहचान की भूख

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन, ये चारों जीवमात्र में विद्यमान होते हैं। मनुष्य ही एक जीव है, जिसके अंदर इन चारों से ऊपर एक शक्ति होती है- अच्छे-बुरे की पहचान। करने और न करने योग्य की पहचान। इसके साथ ही समाज की पहचान। कब, कैसा व्यवहार करना चाहिए, मनुष्य को इस बात की पहचान करनी पड़ती है। इन गुणों को धारण करने वाला ही मनुष्य कहला पाता है। शास्त्रों में तीन एषणाएं बताई गई हैं। पुत्र एषणा, वित्त एषणा और यश एषणा। संतान और धन से सबको मोह होता है। इन दोनों एषणाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य किसी भी हद तक जा सकता है। लेकिन यश की इच्छा उसे सही मनुष्य बनाती है। हर बच्चा जन्म से ही अपनी पहचान बनाना चाहता है। वह बड़ों के सामने उछल-कूद कर अपनी ओर उनका ध्यान आकर्षित करता है। कभी-कभी तो गलत काम भी करता है। दरअसल, वह बड़ों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है। उसकी यही वृत्ति उसके अदंर पहचान की भूख जगाती है। हर मनुष्य के अदंर पहचान की भूख होती है।

एक कहावत है- ‘नामे नाम, या नकारे नाम।’ अर्थात यदि अच्छे कार्यों से पहचान नहीं मिलती, तो गलत काम के जरिये ही पहचान बनाना। पहचान की भूख अन्य शारीरिक भूख से भी जबर्दस्त होती है। तभी तो भिन्न-भिन्न मार्गों से हम अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। ज्यादातर मार्ग सकारात्मक और रचनात्मक ही होते हैं। हम सबको अपने सकारात्मक कार्यों से जहां अपनी पहचान बनाने के प्रयास करते रहने चाहिए, वहीं दूसरों के ऐसे ही कार्यों की पहचान भी करनी चाहिए। परिवार और समाज द्वारा अच्छे कार्यों के लिए मिली पहचान पुन: अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार, अच्छे काम करना उसकी आदत हो जाती है। दूसरों द्वारा मिली पहचान उसे आनंद भी देती है। फिर तो पहचान की भूख बढ़ती जाती है और वह तृप्त भी हो जाता है।

 

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