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बामियान का अंधेरा

बामियान ‘बुद्ध के शहर’ के नाम से मशहूर है। पिछले हफ्ते इसके बाशिंदे अपने मुल्क की राजधानी काबुल पहुंचे, जहां उन्होंने अफगान हुकूमत व अंतरराष्ट्रीय बिरादरी पर भेदभाव बरतने का आरोप लगाते हुए जुलूस निकाला। प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर तरह-तरह के नारे लिखे हुए थे। प्रदर्शनकारी अपने साथ एक बड़ा-सा झाड़-फानूस लेकर आए थे। दरअसल, यह एक प्रतीक था- बामियान में बिजली की कमी का। यकीनन, यह प्रदर्शन उनके आंदोलन का एक हिस्सा है, जिसकी शुरुआत साल 2009 में ही हो गई थी। उस वक्त इलाके में हुकूमत की गलत हिकमत के खिलाफ लोगों ने आवाज बुलंद की थी। पिछले साल ही बामियान के लोगों ने ऊर्जा और जल मंत्रालय को बिजली की कमी की तरफ ध्यान खींचने के लिए लालटेन तोहफे में दिए थे। लेकिन हुकूमत इस मसले पर गूंगी-बहरी बनी हुई है। लोगों की दुश्वारियां बढ़ती जा रही हैं और उनकी वाजिब मांगों की कोई सुनवाई नहीं है। यह बताना जरूरी है कि बामियान अफगानिस्तान के बीचोबीच है। इस शहर के ऐतिहासिक मायने हैं, क्योंकि बुद्ध की सदियों पुरानी बेशकीमती मूर्तियां वहां आज भी हैं। दो दशक पहले तक यह अमन पसंद इलाकों में शुमार था। लोग अपने जम्हूरी अधिकारों का खुलकर इस्तेमाल करते थे। इलाके में बेहतर तालीम का बंदोबस्त था। औरतों को सामाजिक और सियासी जिंदगी में हिस्सेदारी की इजाजत थी। हुकूमत की मदद और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की कोशिशों से सब कुछ र्ढे पर था। लेकिन मुल्क को जो अरबों-खरबों की विदेशी मदद मिली, उससे बामियान की तस्वीर शायद ही बदली। इस दौरान कंधार और हेलमंद जैसे सूबों पर हुकूमत की नजरे-इनायत ज्यादा हुई। हालांकि ये इलाके बामियान की तुलना में ज्यादा महफूज नहीं हैं। वहां दहशतगर्दो का खौफ अब भी कायम है। लेकिन इनके लिए तरक्की के दरवाजे खोल दिए गए। ऐसा लगने लगा है कि 2001 में तालिबान ने बुद्ध की प्रतिमाएं क्या तोड़ीं, बामियान की तकदीर ही बिगड़ गई। हैरत तो तब होती है, जब हुकूमत शांति-सुलह के नाम पर अरबों-खरबों लुटाती है, पर बामियान के बाशिंदों की वाजिब मांग भी दरकिनार कर देती है।
डेली आउटलुक, अफगानिस्तान

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