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प्रयोग या धोखा

चोरी-छिपे जारी चिकित्सा संबंधी परीक्षणों को रोकने के लिए देश के अनेक राज्यों में कई समितियां काम कर रही हैं। लेकिन फिर भी गैरकानूनी तरीके से सब कुछ चल रहा है। अक्सर दलील दी जाती है कि चिकित्सा संबंधी परीक्षणों को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं है। लेकिन यह बस बहानेबाजी है। सच तो यह है कि राज्य सरकारें इस तरह के परीक्षणों को रोकने के प्रति सजग ही नहीं हैं। हाल ही में इंदौर में चोरी-छिपे चल रहे चिकित्सा संबंधी परीक्षण का मामला सामने आया, पर राज्य सरकार कुछ विशेष नहीं कर पाई। देश के अधिकतर राज्यों की कमोबेश स्थिति यही है। अवैध तरीके से किए जाने वाले दवा परीक्षणों के चक्कर में हर साल सैकड़ों निरक्षर व गरीब लोग दम तोड़ देते हैं। इसलिए, केंद्र व राज्य सरकारों को इस दिशा में मिलकर काम करना होगा। जिस तरह से दवा परीक्षण के अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून सख्त हैं, उसी तरह के कानून हमें भी बनाने होंगे। इसके अलावा ऐसी कारगुजारी में संलिप्त डॉक्टरों व कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने की जरूरत है।
रमेश चंद्र साह, नवादा, दिल्ली

बाजार की हेराफेरी
कई बार देखा गया है कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत बाजार से किसी विशेष उत्पाद को हटा दिया जाता है या किसी कंपनी के इशारे पर दूसरी कंपनी के उत्पाद को यों ही स्टॉक में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। बाजार की इस बड़ी हेराफेरी की कीमत उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ती है। मसलन, पिछले दिनों बाजार से एक बेबी मिल्क प्रोडक्ट अचानक गायब हो गई। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की कई दुकानों में मैंने इस प्रोडक्ट को तलाशा, पर कामयाबी नहीं मिली। इसकी वजह कुछ भी हो, लेकिन बच्चों को इससे काफी दिक्कतें आईं। इस तरह की मुश्किलों पर भी राज्य सरकारों को ध्यान देना चाहिए। वरना ऐसी गतिविधियों से कालाबाजारी और मुनाफाखोरी को प्रश्रय मिलेगा।
मीना भुवानिया, ग्रेटर कैलाश, नई दिल्ली

बकाये का चक्कर
किसानों को गन्ने की बकाया राशि जल्द से जल्द मिले, इसके लिए कोर्ट कई बार निजी व सरकारी चीनी मिलों को फटकार लगा चुकी है। परंतु फिर भी इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है। गन्ना किसान अब भी बकाया राशि के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जहां तक वाजिब मूल्य का मसला है, तो फिलहाल यह दूर की कौड़ी ही लगती है। पीलीभीत स्थित एक निजी गन्ना मिल ने अब तक कोर्ट के आदेश को नहीं माना है, जबकि बकाया अंतर मूल्य को चुकाने की तारीख बीते सोमवार को ही खत्म हो चुकी है।
फैज मोहम्मद अंसारी, बिसेन सरदार नगर, पीलीभीत

आस्था और अंधविश्वास
जिस देश में आज भी नजर उतारने के लिए लार्ल मिर्च जलाई जाती है और दान के नाम पर लोग बड़े-बड़े मंदिरों की पेटियां भरते हैं, वहां निर्मल बाबा की असलियत सामने आना कोई बड़ी बात नहीं है। इस देश में हमेशा से आस्था के नाम पर अंधविश्वास हावी रहा है। दुखद यह है कि सिर्फ गांवों में ही नहीं, शहर के पढ़े-लिखे लोग भी इस पाखंड का हिस्सा बनते हैं। मुमकिन है कि निर्मल बाबा की पोल खुलने के बाद फिलहाल कुछ लोग बाबाओं के दरबार में जाना बंद करें, पर कुछ दिनों के बाद इन शिविरों में फिर से भीड़ दिखने लगेगी। अगर हममें आस्था है, तो नए-नए बाबा हमारे सामने आते रहेंगे ही। लेकिन जरूरी यह है कि हम आस्था को अंधविश्वास न बनने दें। हमें समाज में जागरूकता फैलाने की जरूरत है। हमें अपनी सोच अपनी बदलनी होगी, बाबाओं की नहीं।
शुभी, किशनगढ़, दिल्ली

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