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सभी वर्णों के लिए महत्वपूर्ण है चूड़ाकरण संस्कार

संस्कार जीवन की एक नितान्त आवश्यकता है। संस्कारों ने ही जीवनदर्शन को परिभाषित कर प्रत्येक धर्म एवं सम्प्रदाय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रकृति ही सब संस्कारों की आदि स्त्रोत है अर्थात् संस्कार का अर्थ उत्कर्ष की सिद्धि है।

प्रचलित 16 संस्कारों में धर्मशास्त्र एवं आयुर्वेद की दृष्टि से चूड़ाकरण संस्कार अत्यन्त महत्वपूर्ण है। चूड़ाकरण का तात्पर्य है शिखा धारण करना। जन्म के उपरान्त विषम वर्ष में सिर के सर्वोच्च भाग में शिखा को छोड़कर जन्म के समय के केशों को काट दिया जाता है। आचार्य सुश्रुत का कथन है कि सिर के भीतर ऊपर की ओर शिरा तथा सन्धि वाला स्थान ब्रह्मारन्ध्र कहलाता है। इसी में प्राण का वास होता है। इस स्थान पर किसी भी प्रकार का आघात लगने पर व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो जाती है, इसीलिए प्रकृति ने सबसे घने एवं अधिक बाल सिर पर ही दिये हैं।

मनु ने इस संस्कार को पहले या तीसरे वर्ष में तथा पारस्कर ने पहले, तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष में सम्पन्न करना उचित माना है। इस संस्कार का महत्व यजुर्वेद में बताया गया है कि दीर्घायु, बल, अन्नपाचन, पराक्रम, उत्पादन, ऐश्वर्य, सुन्दरता आदि की प्राप्ति हेतु यह संस्कार प्रत्येक जाति, धर्म एवं वर्ण को करना चाहिए। यह संस्कार सिर के त्वचा सम्बन्धी रोगों एवं शरीर ताप को नियन्त्रण करने में अत्यन्त लाभकारी होता है।

चरक ने कहा है कि मस्तक के सर्वोच्च भाग ब्रह्मरन्ध्र में ही प्राण का वास होता है, इसलिए इस स्थान को सुरक्षित रखने का मानव को सर्वथा प्रयत्न करना चाहिए। आधुनिक शरीर शास्त्रियों के अनुसार भी मस्तक के इस भाग में ‘पिटय़ूटरी ग्लेण्ड’ स्थित होता है। इस स्थान की अस्थितियां सुदृढ़ प्राय: जन्म के तीन वर्ष तक ही हो पाती हैं, अत: सभी धर्मशास्त्रियों एवं आयुर्वेद विशेषज्ञों ने इस स्थान की सुरक्षा को देखते हुए शिखा धारण करने का विधान बनाया। यही कारण है कि सिर की सुरक्षा के लिए ही मानव ने पगड़ी को धारण किया और इसी पगड़ी ने टोपी का रूप भी लिया। आयुर्वेद के सुप्रसिद्घ ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में कहा गया है कि केश, नख एवं रोम को न काटना शारीरिक स्वच्छता, हर्ष, उत्साह एवं सुन्दरता के लिए हानिकारक है। चरक ने इस संस्कार को पुष्टि, पुंसत्व, आयु, स्वच्छता एवं सौन्दर्यवर्धक कहा है।

चूड़ाकर्म संस्कार सभी वर्णों के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। चोटी धारण करने की परम्परा आदि काल से प्रचलित है। विशेषकर यह परम्परा गौत्र एवं प्रवर पर आधारित होती है। कुछ लोग दो, कुछ लोग तीन तथा कुछ लोग पांच चोटी तक रखते हैं, पर उत्तरवर्ती काल में एक चोटी ही सर्वमान्य रही। शिखा एवं शिखर भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखते हैं, जैसे किसी भी मंदिर एवं प्रसाद में शिखर की स्थापना अवश्य की जाती है और उस शिखर को किसी भी धातु से निर्मित किया जाता है, जो आकाशीय विद्युत से उस भवन या मंदिर की रक्षा करता है। इसी प्रकार व्यक्ति की चोटी का भी संबंध बहुत गंभीर एवं रहस्यमय है। इससे व्यक्ति का स्वास्थ्य एवं स्मरण शक्ति अच्छी एवं विकसित होती है।

शिखा कोई भी रख सकता है। इसके लिए ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। प्राचीन गुरुकुलों में ब्रह्मचारियों के अध्ययन के समय चोटी पर विशेष ध्यान दिया जाता था व किसी छात्र को आचार्य अध्ययन के समय चोटी को रस्सी से बांधकर पढ़ने के लिए कहता था। अध्ययन के समय यदि वह सो जाए तो उसकी चोटी खिंच जाती थी और वह जग जाता था। चोटी के रहस्य को मगध साम्राज्य भली-भांति जानता है, क्योंकि मगध नरेश ने आचार्य चाणक्य की चोटी खींच कर ही अपमान किया था। आचार्य चाणक्य ने उसी के बाद यह संकल्प लिया कि जब तक मैं इस अत्याचारी नन्दवंश का नाश नहीं कर लेता, तब तक मैं चोटी को नहीं बांधूगा।

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