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गरीबों का दर्द कम करते नीतीश तो अच्छा होताः लालू

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने मुम्बई में बिहार शताब्दी समारोह मनाने को नाटक करार दिया है। उनका कहना है कि इस समारोह के माध्यम से बेवजह विवाद पैदा करने की कोशिश की गई है। इससे बेहतर होता कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिलों में जाते और सकारात्मक काम करते। समारोह मनाने से गरीबों का दर्द कम नहीं होता है। उनकी परेशानियों को दूर करने के लिए अगर मुख्यमंत्री गंभीर होते तो बड़ी बात होती। 

प्रसाद ने कहा कि राज्य में अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। आम आदमी असुरक्षित है। गांव व अन्य शहरों की कौन कहे, राजधानी पटना में अपराधी बेलगाम है। दिनदहाड़े लूट और डकैती की घटना को अंजाम दिया जा रहा है। पटना में दिन में भी महिलाएं आभूषण पहनकर निकलने से डर रही हैं। दिन में ही महिलाओं से चेन लूटी जा रही है। पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है। भ्रष्टाचार चरम पर है। पंचायत से लेकर मुख्यालय तक इसकी चपेट में है। सरकारी योजनाओं में लूट मची है। कल्याणकारी योजनाओं का सिर्फ ढिंढ़ोरा पीटा जा रहा है। गरीबों की समस्या सुनने वाला कोई नहीं। अफसरशाही बेलगाम है।

प्रसाद ने इस बात पर हैरत जताया कि जब उन्होंने मुम्बई में छठ मनाने का निर्णय लिया तो उसे पॉलिटिक्स बताया गया। यहां तक कहा गया कि यह बिहारियों को पिटवाने के लिए किया जा रहा है। जमकर विरोध किया गया। नीतीश कुमार इसमें सबसे आगे थे। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि मेरी छठ पॉलिटिक्स थी और इनका समारोह? नीतीश कुमार ने राज ठाकरे के समक्ष सरेंडर किया है। उनका ‘आदमी’ राज ठाकरे से जाकर मिला और फिर उन्हें मैनेज किया गया। इससे गौरव बढ़ रहा है क्या? क्या यह सब पॉलिटिक्स नहीं है? लेकिन, अगर लालू कुछ बोलें या करें तो वह पॉलिटिक्स हो जाती है।

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