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ब्रिटेन के मुसलमानों की राजनीति

बीते गुरुवार को इंडोनेशिया की राजधानी जाकार्ता में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने एक भाषण में कहा कि ‘लोकतंत्र और इस्लाम एक साथ फल-फूल सकते हैं।’ यानी उनके कहने का मतलब यह था कि ऐसा अक्सर देखने को नहीं मिलता। लेकिन ब्रिटेन को ध्यान में रखें, तो कैमरन की यह टिप्पणी किसी विडंबना से कम नहीं। इस भाषण के ठीक दो हफ्ते पहले ब्रिटेन के एक उत्तरी शहर में मुसलमानों ने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए वोट डाले। उनके वोटों की बदौलत ही ब्रेडफोर्ड वेस्ट के सांसद के तौर पर जॉर्ज गेलोवे चुने गए। खैर, ऐसा करते हुए वहां के मुस्लिम मतदाताओं ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस्लाम, विदेशी मुसलमान, पूरब और पश्चिम एशिया उनके लिए मायने रखते हैं, परंतु स्थानीय मुद्दे उनके लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

इस दौरान उस इलाके में राजनेता और पत्रकार ‘बिरादरी’, ‘कुनबे’ और ‘राजनीति में भाई-भतीजावाद’ जैसे मसलों पर बहस करते दिखे। बिरादरी की सोच एक पितृसत्तात्मक अवधारणा है, जो जाति का ही एक रूप है। आम तौर पर पाकिस्तानी लोग इस शब्द का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। वे एक जातिगत समुदाय से जुड़े सभी लोगों को बिरादरी कहते हैं। उसी तरह पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिकों में रिश्तेदारी वाकई एक सामाजिक संगठन की भूमिका निभाती है। रक्त संबंधों और परिजनों के लिए यह एक आपसी कल्याणकारी तंत्र की तरह है। हालांकि बिरादरी राजनीति, जिसे ब्रेडफोर्ड वेस्ट से जोड़कर देखा जा रहा है, ब्रिटेन में सामान्य है। यूनाइटेड किंगडम में राजनेता समुदायों व अलग-अलग संप्रदायों के नेताओं के जरिये मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए बिरादरी पॉलिटिक्स करते हैं। बर्मिघम में स्पार्कब्रुक निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए रॉय हैट्टरस्ले ने एक बार कहा था कि जब भी उन्होंने मतपत्र पर पाकिस्तानी नाम को देखा, वह जान गए कि यह वोट उन्हीं के हिस्से में आएगा। गौरतलब है कि स्पार्कब्रुक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है।

ब्रेडफोर्ड वेस्ट में गैलवे समर्थक काफी युवा हैं। वे ब्रिटेन में जन्मे पाकिस्तानी मुसलमान हैं, जो ब्रेडफोर्ड के निवासी हैं। वे युद्ध के बाद यहां कमाई के लिए आ बसे प्रवासियों के पोते और परपोते हैं। ऐसे अधिकतर प्रवासी उत्तर के विनिर्माण उद्योग व कपड़ा मिलों में दिहाड़ी मजदूर होते थे। इन इलाकों में बिरादरी आधारित राजनीति लगभग 40 साल से चली आ रही है। लेकिन उस अगुवा पीढ़ी के बच्चे ब्रिटेन में ही जन्मे और पले-बढ़े हैं। वे इस तरह की राजनीति में खुद को पहचान नहीं पाते हैं। उन्हें लगता है कि सामुदायिक नेताओं का उन मसलों से कोई लेना-देना नहीं है, जिनसे वे वास्तविक जिंदगी में प्रभावित होते हैं। संरक्षण आधारित इस राजनीति का एक ही निहितार्थ है कि नेताओं को वोटों के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती है। तभी तो इस तरह की राजनीति से विमुख युवा मतदाता जॉर्ज गेलोवे की ओर आकर्षित हुए। यकीनन, गेलोवे की भाषण शैली और सार्वजनिक बहस की क्षमता ने उन्हें मजबूती दी है। कुछ लोगों के मुताबिक, ब्रेडफोर्ड वेस्ट के परिणाम ‘वन-ऑफ रिजल्ट’ है, यानी सबसे अलग और विशिष्ट। ऐसे लोग मानते हैं कि यह एक बेजोड़ राजनेता का करिश्मा है, जो वाकई मुस्लिम बहुल आबादी की नुमाइंदगी के हकदार हैं।

गेलोवे को पाकिस्तानी मूल के लोगों के नायक के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि वह एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने इराक और अन्य मुस्लिम चिंताओं पर बनी यथास्थिति को चुनौती दी थी। मुमकिन है कि इसी वजह से उन्हें वर्ष 2005 में ग्रेटर लंदन के बेथनल ग्रीन ऐंड बो संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से जीत मिली। लेकिन यह सोचना काफी भ्रामक है कि उन्हें ब्रेडफोर्ड वेस्ट की लड़ाई में जीत इसलिए ही मिली, क्योंकि ब्रिटेन के युवा मुसलमान युद्ध जैसी घटनाओं से लगातार जूझ रहे थे। हालांकि, उनकी दिलचस्पी मुसलमानों से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय समस्याओं में हो सकती है, पर यह भी हकीकत है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति उनके नजरिये को एक हद तक प्रभावित करती है। ऐसे में, वह कौन-सा मसला है, जिसने असर डाला? वह है- स्थानीय राजनीति की ग्लैमरहीन दुनिया। सड़कों-गलियों में बिजली की व्यवस्था, बच्चों के लिए स्कूल, कूड़े की सफाई और कीड़े-मकोड़े व दवा की समस्याएं, चुनाव में ये सब महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यही नहीं, ब्रिटेन में अवसरों की कमी है, जो कि रोजी-रोटी से जुड़ा मसला है।
जॉर्ज गेलोवे की जीत को कुछ पाकिस्तानी मूल के लोग एक बड़ी जीत बता रहे हैं। इनका तर्क है कि अगर विदेशी मुसलमानों के बारे में गेलोवे सकारात्मक बोल रहे हैं, तो वह उनकी भी हिफाजत करेंगे। वह मुख्यधारा की लड़ाई लड़ने में उनकी मदद करेंगे। वे मानते हैं कि सामुदायिक नेताओं की पुरानी पीढ़ी ने उनकी सोच को सही तरीके से नहीं रखा और वे बस संरक्षक की भूमिका ही निभा पाए, क्योंकि वे अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र में टिके रहना चाहते थे।

खैर, ब्रेडफोर्ड वेस्ट में मिली शिकस्त से लेबर पार्टी बौखलाई हुई है। बेस्सेटलॉ से सांसद व पार्टी के नेता जॉन मान इस हार का ठीकरा पार्टी पर फोड़ते हुए कहते हैं कि स्थानीय लोगों के लिए पार्टी के पास कोई रणनीति नहीं थी। हालांकि, कहानी ठीक इसके विपरीत है। पार्टी के पास रणनीति तो थी ही। समस्या यह रही कि रणनीति काफी पुरानी थी, वही पुरानी मान्यता कि सामुदायिक नेता लेबर पार्टी के स्थानीय उम्मीदवार की जीत को सुनिश्चित करेंगे। तो ब्रेडफोर्ड वेस्ट उपचुनाव के नतीजे ने नाटकीय ढंग से एक तथ्य को उभारा है। वह यह है कि लेबर पार्टी समेत मुख्यधारा की सभी राजनीतिक पार्टियां पाकिस्तानी मूल की पुरानी पीढ़ियों के साथ वही पुरानी संरक्षणवादी संबंधों पर भरोसा करती हैं। लेकिन ब्रिटेन में रह रहे पाकिस्तानी मूल के युवा वहां के लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। वैसे, मजहबी पहचान और स्थानीय मसले साथ-साथ ही पनपेंगे। नेताओं को अब अपने वोट कमाने होंगे, उन्हें यह उम्मीद कतई नहीं रखनी चाहिए कि ऐसे ही वोट मिल जाएंगे। यही लोकतंत्र है, जो पूरब में भी है और पश्चिम में भी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
साभार: गाजिर्यन

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