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बाघ नहीं बचे तो चीता कैसे बचेगा

भारत सरकार ने देश से लुप्त हो चुके चीते को फिर से बसाने की तैयारी कर ली है। कुल बारह चीतों को मध्य प्रदेश के कुनो पालपुर अभयारण्य में अफ्रीका के नामीबिया से लाकर बसाया जाएगा। जून महीने में ये चीते भारत पहुंच जाएंगे। इस समय कुनो पालपुर में मेहमान चीतों के भोजन की व्यवस्था की जा रही है। नामीबिया कुल पचास चीते भारत को देने को तैयार हो गया है। इन्हें मध्य प्रदेश के आलावा राजस्थान के जैसलमेर और गुजरात में भी अगले चरणों में बसाए   जाने की योजना है।
दिलचस्प बात यह है कि सत्तर के दशक में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी ईरान से चीते लाने की योजना बनाई गई थी। लेकिन ऐन वक्त पर किसी कूटनीतिक अड़चन के कारण वह योजना टाल दी गई। इस समय ईरान में करीब पचास चीते ही बचे हैं। फिलहाल अफ्रीका और ईरान में ही चीते पाए जाते हैं। नामीबिया सरकार चीतों के अवैध शिकार से परेशान हैं। वहां के जगंलों में भी घास के मैदान कम या खत्म हो रहे हैं। बड़ी तेजी से वहां जंगलों का अतिक्रमण हो रहा है। यही वजह है कि वह भारत को पचास चीते देने पर सहमत हो गया है।

भारत में किसी समय हजारों की संख्या में चीते हुआ करते थे। कहते हैं कि  मुगल बादशाह अकबर के शिकारगाह में ही लगभग पांच हजार चीते हुआ करते थे। बहरहाल, छत्तीसगढ़ से लेकर कर्नाटक होते हुए तमिलनाडु और केरल तक के विशाल घास के मैदानों में चीतों का राज था। कहते हैं कि सरगुजा के राजा रामानुज शरण सिंह ने अकेले 1,368 बाघों का शिकार किया था और साल 1968 में देश के आखिरी चीते के शिकार का सेहरा भी सरगुजा के राजा के सिर ही बांधा जाता है।

जानकारों का कहना है कि चीतों के आने से पर्यटन क्षेत्र को लाभ होगा। इसके आलावा उनके आने से चरागाह भी बचेंगे। चीता फूड चेन में सबसे ऊपर आता है। लिहाजा वह पूरे इकोसिस्टम को बचा सकता है। चरागाह बचेंगे, तो जैसलमेर में गोंडावन पक्षी को भी बचाया जा सकेगा। उधर चीतों को लाने का विरोध करने वालों का कहना है कि भारत में इतने बड़े चारागाह बचे ही नहीं हैं, जहां चीतों को बसाया जा सकेगा। गांव हटाने पड़ेंगे, इस पर बवाल मचेगा। फिर उन्हें जिन अभयारण्यों में बसाने की योजना है, उनमें चीतों के लिए बहुत शिकार नहीं    हैं। उल्टे चीतों का बाघों की तरह शिकार नहीं होगा, इसकी भी गारंटी नहीं है।
  
आखिरी आशंका डराती है। कभी भारत में 40 हजार से ज्यादा बाघ थे, आज 1,411 ही बचे हैं। राजस्थान में सरिस्का और मध्य प्रदेश में पन्ना टाइगर रिजर्व दुनिया के पहले ऐसे टाइगर रिजर्व हैं, जहां अब एक भी बाघ नहीं है (दोनों ही जगह पिछले दो सालों में दूसरे राज्यों से बाघों को लाकर बसाया गया है)। हैरत की बात है कि यही दो राज्य हैं, जहां चीते को बसाए जाने का फैसला किया गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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