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सिरों पर सवार भौतिकता का भूत

कुछ जेल में हैं, कुछ बाहर। कैद सब हैं, बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक। मां-बाप की इकलौती हसरत संतान की सफलता है, फिलहाल स्कूल में, बाद में जीवन के इम्तिहान में। इस प्रतियोगी माहौल में खेल-कूद, आजादी, बचपना आदि अतीत की बातें हो गई हैं। क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल, हॉकी जैसा कोई भी खेल मन-बहलाव के लिए नहीं, कोच की निगरानी में पेशेवर बनने को खेला जाता है। हर शहर में कोचिंग संस्थान हैं। उन सब में जगह पाने के लिए जुगाड़ की दरकार है। शहर में खुले मैदान भू-माफिया के शिकार हैं। नहीं तो हमें यकीन है कि क्रिकेट कोचिंग केंद्रों की संख्या दवा, दारू और अंग्रेजी बोलने के प्रशिक्षण देती दुकानों से शर्तिया टक्कर लेतीं।

जानकार बताते हैं कि वर्तमान व्यवस्था में ये सब कामयाबी के थोक सप्लाई केंद्र हैं। कुछ का करियर सरकार के ईमानदार कल-पुर्जों को महंगी शराब की भेंट-गिफ्ट से बनता है। कल-पुर्जे कायर हैं। कैश से डरते हैं, पर काम तभी करते हैं, जब बोतल या कुछ और मुफ्तिया आकर्षण उन्हें प्रेरित करें। इसके विपरीत ऐसे सूरमा भी हैं, जो भ्रष्टाचार की लंका के दशानन हैं। शुचिता की सीता के दिन-दहाड़े अपहरण पर प्रशंसक उनके गुण गाते हैं, ‘दफ्तर के जंगल का इकलौता बब्बर शेर है यह अफसर।’ किसी सरकारी विभीषण से बेखौफ। जब राम ही नहीं हैं, तो विभीषण क्या कर लेगा? दवा के विक्रेता भी उन्हीं की तरह निर्भीक हैं। फल, सब्जी, आटे, दाल, दवा वगैरह में मिलावट उतनी ही रूटीन है, जैसे आज के कमीशन आधारित निर्माण कार्यों की सीमेंट में बालू। सब जानलेवा है। पर किसे फिक्र है?

भगवान से लेकर स्कूल और उच्च शिक्षा के मंदिर भी मुनाफे पर कुर्बान हैं। धर्म भी धंधा है, पढ़ाई भी। गुरु शोध के पेशे में हैं। रसद-राशन की नियमित जुगाड़ चेलों के जिम्मे है। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों जैसे हैं ऐसे गुरु-घंटाल। न डॉक्टरों को हिप्पोक्रेटस की कसम याद है, न गुरुओं को आचार्यों की परंपरा। भौतिकताका भूत हर वर्ग के सिर पर सवार है। इन हालात में सियासी तबके से सेवा, त्याग, सिद्धांत की क्या अपेक्षा? वे भी तो इसी जमीन पर जन्मे इंसान हैं, आसमान से टपके फरिश्ते नहीं।

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