DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

प्रेम सफल कैसे बने

प्रेम की शुरुआत बहुत सुंदर होती है। सब मधुर और सरस होता है, लेकिन शीघ्र ही अंदर छिपी हुई ईर्ष्या, एकाधिकार जैसे दुर्भाव फन उठाते हैं और प्रेम को मलिन कर देते हैं। जिससे प्रेम है या महज मित्रता भी है, तो दूसरा व्यक्ति नहीं चाहता कि हमारा साथी किसी और से भी उतना ही घुल-मिलकर बातें करे। डर लगता है कि वह किसी और के करीब न आ जाए। यह डर प्रेम का गला घोंट देता है, क्योंकि प्रेम खिलता है स्वतंत्रता में। घुटन में प्रेम जी ही नहीं सकता। हर व्यक्ति के भीतर एक छोटा बच्चा बसता है, जो उम्र बढ़ने के बावजूद बड़ा नहीं होता। जब प्रेमी एक-दूसरे को कब्जे में रखना चाहते हैं, तो यह उनके अंदर का बच्चा ही है, जो अपने मां-बाप को पकड़ना चाहता है, उनका पूरा ध्यान अपने ऊपर ही चाहता है। प्रेम देने की चीज है, मांगने की नहीं। यह तो बच्चे जैसी हरकत है। बच्चा जरूरतमंद होता है। बच्चा स्वयं को संपूर्ण अस्तित्व का केंद्र मानता है। यह बचकाना है। कोई भी व्यक्ति संपूर्णता का केंद्र नहीं होता।
ओशो ने इसके लिए भी एक ध्यान बताया है, अपने भीतर छिपे बच्चे से सावधान रहने के लिए। रोज कम से कम एक घंटा शांत होकर बैठें और अपने अंदरूनी बच्चे को देखते रहें। मूल्यांकन न करें, उसकी आलोचना न करें, क्योंकि इससे कोई काम नहीं बनेगा। अच्छा या बुरा कहे बिना, खुले मन से सिर्फ देखते रहें। बच्चे को पूरी बात कहने दें। देखिए कि यह कैसे क्रिया करता है, कैसे उछल-कूद करता है, और सिर्फ इसे देखते हुए, इसकी मूर्खता को देखते हुए, व्यक्ति में परिवर्तन आने लगता है। इस पर ध्यान करें। वह चला जाएगा। लेकिन यह तभी जा सकता है, जब आप इसके प्रति पूर्ण रूप से सजग हो जाते हैं। उसके बाद आपका प्रेम या मित्रता एक परिपक्व आदान-प्रदान होगा। आप जितना देंगे, उतना ही लौटकर आएगा। मांगने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:प्रेम सफल कैसे बने