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रचनात्मकता का नशा

लेखकों और कलाकारों की छवि के साथ अक्सर शराब जुड़ी होती है। हालांकि शराब पीने वालों में ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा ही होगी, जो कोई रचनात्मक या कलात्मक काम नहीं करते, लेकिन रचनात्मकता के साथ शराब का रिश्ता कुछ गहरा मान लिया गया है। यह भी सच है कि शराबखोरी ने अनेक प्रतिभाशाली और सृजनशील लोगों का जीवन असमय खत्म कर दिया है। क्या रचनात्मकता और शराब का सचमुच कोई रिश्ता है या यूं ही इसे रूमानी रंग दे दिया गया है? अमेरिका के इलिनॉय यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस तथ्य की या भ्रम की वैज्ञानिक जांच की, तो पाया कि खून में एक निश्चित स्तर तक अल्कोहल की उपस्थिति रचनात्मक क्षमता को बढ़ाती है। इन वैज्ञानिकों ने 40 नौजवानों को कुछ खास किस्म की समस्याएं या पहेलियां हल करने को दीं, जिन्हें रैट टेस्ट या रिमोट एसोसिएट टेस्ट कहते हैं। इनमें काफी असंबद्ध दिखने वाले तथ्यों को जोड़कर या दूर की कौड़ी लाकर हल करने वाले सवाल होते हैं। यह पाया गया कि जिन नौजवानों के खून में अल्कोहल का स्तर 0.75 था, यानी लगभग एक बोतल बीयर पीने के जितना, उन्होंने ये सवाल ज्यादा तेजी से हल किए और उनकी दूर की कौड़ी लाने या असंबद्ध तथ्यों का संबंध ढूंढ़ने की क्षमता भी ज्यादा थी। यह भी जांच की गई कि तथ्यों पर ध्यान देने, जरूरी तथ्यों को चुनने और अमहत्वपूर्ण तथ्यों की उपेक्षा करने की क्षमता पर अल्कोहल का क्या असर होता है, क्योंकि आखिरकार समस्या सुलझाने में इन्हीं गुणों का वास्ता पड़ता है। इसमें यह पाया गया कि अल्कोहल इन क्षमताओं को भी बढ़ाता है। वैज्ञानिक यह मानते हैं कि शराब से दिमाग रिलैक्स हो जाता है, इसलिए वह ज्यादा बड़े फलक पर चीजों को समझ पाता है और जरूरी तथ्यों पर ध्यान केंद्रित कर पाता है।
इससे यह भी समझ में आता है कि शराब पीकर वाहन चलाने वाले लोग क्यों ज्यादा दुर्घटना के शिकार होते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि शराब से दिमाग की गति भले ही तेज हो जाए, लेकिन शरीर सुस्त हो जाता है। शराब पीकर वाहन चलाने वाले इसीलिए ज्यादा आत्मविश्वास से भरे दिखते हैं, क्योंकि उनका दिमाग जो कुछ सामने दिख रहा है, उसका आकलन ज्यादा तेजी से करता है, लेकिन उन्हें यह ख्याल नहीं होता कि उनका शरीर ज्यादा सुस्त हो गया है और वह उतनी तेजी से गतिविधि नहीं कर पाता। ऐसे में, दिमाग और शरीर का तालमेल गड़बड़ हो जाता है और उससे दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि इन निष्कर्षो पर और ज्यादा शोध की जरूरत है। यह भी हम जानते हैं कि लेखक और कलाकारों में शराब पीने वालों की तादाद काफी है, लेकिन शराब किसी खराब लेखक को अच्छा लेखक या खराब गायक को अच्छा गायक नहीं बना सकती। मिर्जा गालिब शराब के शौकीन थे यह सच है, लेकिन उनसे दस गुना ज्यादा शराब पीने वाले कई शायर गालिब जैसा एक शेर भी नहीं लिख पाए। यह भी सच है कि एक हद से ज्यादा शराब का दिमाग पर खराब असर होता है, ज्यादा शराब सोचने की क्षमता, तर्क और कल्पनाशीलता को कुंद भी करती है, इसलिए इस बात के भी उदाहरण हैं कि शराबखोरी ने कई प्रतिभाशाली कलाकारों की कला को नष्ट कर दिया। रचनाशीलता के लिए जरूरी है कि कल्पना अपनी सीमाओं को पार करे, शराब दिमाग को वह स्वतंत्रता पाने में मदद करती है, वह बंधनों को शिथिल करती है। लेकिन रचनात्मकता के लिए सतर्क विवेक और अनुशासन की भी जरूरत होती है और यह भी जरूरी है कि शराब पीने को ही रचनात्मक काम न मान लिया जाए, जैसे कई लेखक, कलाकार करते हैं।

 

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