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निशाने पर नौनिहाल

महज फिरौती वसूलने के लिए या फिर किसी से खुन्नस निकालने के लिए बच्चों के खिलाफ बर्बरता और हत्या की घटनाएं बांग्लादेश में खतरनाक तरीके से बढ़ती जा रही हैं। सबसे ज्यादा जो बात परेशान करने वाली है, वह इन बर्बर कांडों को अंजाम देने में शामिल कातिलों की मानसिकता है। हाल ही में घटी एक घटना में 13 साल के नईम की फिरौती न मिलने पर जिस तरह से गला घोंटकर हत्या कर दी गई और फिर ईंट भट्टी में उसकी लाश जलाई गई, उसने पूरे सभ्य समाज का हिला दिया है। इस कांड का मुख्य दोषी जकारिया अब तक पकड़ा नहीं जा सका है। बदकिस्मती से यह कोई पहला वाकया नहीं है, जब ऐसे जुल्म का शिकार कोई मासूम बना है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब ढाका के दारुसलाम इलाके में जालिमों ने फिरौती के लिए सात साल के तन्मय की जान ले ली थी। ये घटनाएं तो सिर्फ मुल्क की राजधानी से जुड़ी हैं, जो महज बानगी भर हैं। ऐसी दुखद व बर्बर घटनाएं मुल्क के भीतर बड़ी संख्या में घट रही हैं और उनमें से चंद ही मीडिया की निगाहों में आ पाती हैं। जाहिर है, बच्चों के खिलाफ होने वाली ये घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि देश में लॉ ऐंड ऑर्डर की स्थिति अच्छी नहीं है। दुखद बात तो यह है कि ऐसे ज्यादातर मामलों में पुलिस को कोई खबर मिलती भी है, तब भी वह उस घटना को घटने से रोकने में नाकाम हो जाती है। अव्वल तो वह अगवा करने की साजिश रचने वालों को समय रहते गिरफ्तार नहीं कर पाती और यदि उसे कोई कामयाबी मिलती भी है, तो वह उसे ठीक से अदालत के सामने रख नहीं पाती। इन दिल दहलाने वाली हत्याओं को देखते हुए हमें समाज के भीतर पल रहे इस निर्मम नासूर की जड़ों पर गौर करना होगा। आखिर कोई इंसान इतना जालिम कैसे हो सकता है? यही वक्त है, जब मनोविज्ञान से जुड़े दिग्गज यह पता लगाएं कि आखिर कातिलों के दिमाग में ऐसी क्या गड़बड़ियां हैं, जो इस कदर बेदर्दी से वे मासूम बच्चों को कत्ल कर रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों को न सिर्फ कारणों पर रोशनी डालनी चाहिए, बल्कि उन्हें दूर करने के उपाय भी सुझाने चाहिए।
द डेली स्टार, बांग्लादेश  

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