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अमरकांत रचना संचयन

वरिष्ठ रचनाकार अमरकांत लंबे समय से साहित्य के क्षेत्र में सेवारत हैं। उनके रचना जगत में समाज में दैनंदिन के छोटे-छोटे संघर्षो से लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक जगत के व्यापक दायरे पर गहरा चिंतन मिलता है। प्रस्तुत रचना संचयन में उनकी जानी-मानी कहानियों ‘जिंदगी और जोंक’, ‘डिप्टी कलक्टरी’, ‘दोपहर का भोजन’ के साथ-साथ उनके कुछ रोचक संस्मरण और उपन्यास अंश उपलब्ध हैं। संचयन समृद्ध है, लेकिन इसमें अमरकांत जी के मशहूर उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ के अंश दिए जाने के पीछे का तर्क समझ नहीं आता। इससे पहले भी कुछ रचनाकारों के संचयन में उनके अधूरे उपन्यास छापे गए थे। बेहतर होता यदि एक उपन्यास पूरा दिया जाता, चाहे रचनाओं की संख्या कुछ सीमित होती। अमरकांत संचयन, संपादक: रवींद्र कालिया, प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-3, मूल्य: 480 रु.

भीष्म साहनी साहित्य विमर्श
प्रस्तुत पुस्तक स्वर्गीय भीष्म साहनी को समर्पित है। पुस्तक की रचना श्रद्धांजलि स्वरूप में एक ईमानदार प्रयास है और संपादक राजेंद्र उपाध्याय ने अनेक नए-पुराने रचनाकारों से सामग्री एकत्र करने में खासी मेहनत की है। नेमिचंद्र जैन, नामवर सिंह, कमलेश्वर, विश्वनाथ त्रिपाठी, निर्मल वर्मा और कई अन्य रचनकारों व आलोचकों ने भीष्म साहनी के नाटकों, उपन्यासों, कहानियों और आत्मकथा पर बात की है। छोटे-छोटे इन आलेखों में भीष्म साहनी के रचना जगत का संपूर्ण ब्योरा आता है। तमस, हानूश और चीफ की दावत जैसी उनकी रचनाओं पर सचेत टिप्पणियां उनके हर पक्ष को उकेरती हैं। लेकिन काश कि प्रकाशक पुस्तक संकलित करते समय पृष्ठ संख्या पर भी नजर डाल लेता! भीष्म साहनी, पहचान और परख, सं.: राजेंद्र उपाध्याय, प्रकाशक: विशाल पब्लिकेशन, पटना-4, मूल्य: 300 रु.

अपने समय पर चुटकी
हिन्दी जगत में व्यंग्य की मौजूदा स्थिति कुछ पुख्ता होती दिख रही है। अपने-अपने तरीके से कई व्यंग्यकार समय की दशा-दिशा का जायजा ले रहे हैं। सुशील सिद्धार्थ ने भी अपने व्यंग्य की धार और दिशा को इसी ओर मोड़ कर अधिकाधिक पैना बनाने की ठानी है। प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह में वह लोक जगत के साथ-साथ अपने निजी जगत को भी ले आते हैं और उन पर चुटकी लेते हैं। लेकिन उनकी चिंताओं के केंद्र में बसा है राजनीतिक जगत का मौजूदा परिवेश। खुद शीर्षक व्यंग्य ‘नारद की चिंता’ इसी ओर इंगित करता है। सुशील सिद्धार्थ के व्यंग्य की भाषा शालीनता की उदाहरण है और उनकी गहराई व्यंग्य विषय-वस्तुओं से ही जाहिर हो जाती है। जाहिर है यह अनुभव की बात है। नारद की चिंता, लेखक: सुशील सिद्धार्थ, प्रकाशक: सामयिक प्रकाशन, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली-2, मूल्य: 395 रु.

महाशय की दास्तान
पिछले कई दशकों से देश में भोजन में इस्तेमाल होने वाले मसालों की दुनिया में एमडीएच का नाम अब एक किंवदंती का रूप ले चुका है। एमडीएच के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी के जीवन की कहानी इस पुस्तक में दी गई है। देश विभाजन से भी दो दशक पूर्व सियालकोट में जन्मे धर्मपाल गुलाटी ने 1947 के बाद किस तरह से भारत आकर अपना संघर्ष शुरू किया, शुरुआती दिनों में तांगा चलाकर अपने परिवार का पेट पाला और फिर छोटी-सी दूकान से शुरुआत कर आज मसालों के शहंशाह कहलाते हैं। पूरी दास्तान सीधी-सरल भाषा में पुस्तक में दी गई है। एक खांटी देसी शख्सियत के मालिक धर्मपाल गुलाटी की जीवन यात्रा अपने आप में प्रेरणा तो देती ही है, व्यवसाय संचालन के गुर भी बताती है। मसालों के शहंशाह, प्रकाशक: नई सदी बुक हाउस, दिल्ली-9, मूल्य : 325 रु. संदीप जोशी

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  • Web Title:अमरकांत रचना संचयन