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सारे फैसले शासक दल ही नहीं ले सकता

आपने कहा था कि जिंदगी बजट के साथ शुरू और खत्म नहीं होती, कई और दवाएं हैं, जो देनी पड़ती हैं। क्या आप इन दवाओं के बारे में कुछ बताएंगे?

पहली बात तो यह है कि बजट की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। और मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि तकनीकी रूप से अभी संसद का सत्र चल रहा है, सिर्फ एक रीसेस हुआ है, ऐसे में नीतिगत विषयों पर मैं ज्यादा बोल नहीं सकता। अगर मैं किसी नीतिगत विषय पर कुछ घोषणा करता हूं, तो संसदीय विशेषाधिकार के तहत पकड़ लिया जाएगा। वैसे जब मैंने यह बात कही थी, तो मेरा मतलब था कि हमें कुछ कड़े फैसले करने पड़ते हैं। मैंने अपने बजट में कहा था कि मैं चाहूंगा कि सब्सिडी को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के दो फीसदी से नीचे 1.75 फीसदी पर ले आऊं। खाद्य सब्सिडी को छोड़कर हमें बाकी सारी सब्सिडी को देखना होगा और इस पर फैसला करना होगा। लेकिन ये फैसले ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ सरकार अपने बूते नहीं कर सकती। इसमें कई ऐसे फैसले हैं, जिन्हें संसद में बहुमत के समर्थन से ही किया जा सकता है या अगर कई ऐसे भी हैं, जिन्हें सिर्फ कार्यपालिका अपने बूते कर सकती है, तो भी इन पर राजनीतिक दलों की सहमति जरूरी होगी, क्योंकि अगर वे सहमत नहीं हुए, तो इसे बदल देंगे। कई बाधाएं हैं, जिन्हें हमें ध्यान में रखना ही होगा। इसीलिए मैं यह सुझाव दे रहा हूं कि हमें दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। उन्हें इसकी जरूरत बताकर रजामंद करना होगा। मैं इसी दवा की बात कर रहा हूं। कई फैसले ऐसे हैं, जिन्हें बजट सत्र के बाद जो थोड़ा समय हमें मिलेगा, उसी में करना है।
 
आज दुनिया भर में काफी बड़ी आर्थिक और वित्तीय चुनौतियां हैं, आप इन्हें कैसे देखते हैं?
अगर आज इन सबका भारत के वित्तीय क्षेत्र पर कोई असर नहीं पड़ा है, अगर आज दूसरे कई देशों के मुकाबले भारतीय कंपनियों को भारी घाटा नहीं हो रहा है, तो इसका कारण है कि उन्होंने अपने आप को खतरनाक संपत्तियों के चक्कर में पड़ने से रोके रखा। यह व्यापारिक फैसलों में उनके बुद्धि के इस्तेमाल के कारण ही हुआ। अब सवाल है कि अच्छी और बुरी संपत्ति की विभाजन रेखा आप कहां खींचेंगे? हालात को देखते हुए उन्हें फैसले लेने होंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि व्यापारिक समुदाय के नेता, चाहे वे उत्पादन क्षेत्र के हों या वित्तीय क्षेत्र के या फिर निवेश क्षेत्र के, उनमें ऐसे फैसले लेने का साहस है।
 
बजट के बाद तो वे आपसे नाराज भी होंगे?
मैं जानता हूं कि वे सब मुझसे निराश होंगे। उन्हें मुझसे जितनी उम्मीदें थीं, उतना मैं कर नहीं सका। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बजट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके हर शब्द पर संसद की अनुमति चाहिए होती है। टैक्स और खर्च के प्रस्ताव और यहां तक कि धन की निकासी का वित्त मंत्री का अधिकार सब कुछ संसद सदस्यों के बहुमत पर निर्भर करता है। इसलिए मैंने जो भी किया, काफी सचेत होकर किया है। मैं ऐसे हालात नहीं बनाना चाहता था कि मेरे प्रस्ताव संसद में गिर जाएं। एक राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर मैं जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर सकता। यह मेरिट या डीमेरिट का मामला नहीं है। यह तार्किक और अतार्किक होने का मामला है। यह मामला इस तथ्य से जुड़ा है कि अगर मैं दूसरों को साथ लेकर नहीं चल सकता, तो प्रस्तावों को लागू करना मुश्किल होगा। इसे लेकर आप मुझ पर आरोप लगा सकते हैं और मैं इस आरोप को विनम्रता से स्वीकार भी कर लूंगा। हां, मैं अभी तक सबको साथ लेकर चलने में सफल नहीं रहा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आगे भी ऐसा ही होगा और भविष्य में भी मैं उन्हें अपने साथ लेकर नहीं बढ़ सकूंगा।

दो जुमले इन दिनों बहुत सुनाई देते हैं, एक है पॉलिसी पैरालिसिस या नीति निर्माण को लकवा मार जाना, दूसरा है स्पूक्ड या भूत बना देना। इन दोनों जुमलों में आपको सबसे बुरा कौन-सा लगता है?
सबसे पहले तो मैं यह बता दूं कि नीति निर्माण को लकवा नहीं मारा है, बहुत सारे नीतिगत फैसले हुए हैं। मसलन, आप मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी को ही लें, विद्युत संयंत्रों को ईंधन आपूर्ति पर हुए फैसले को लें, पोषण आधारित उर्वरक नीति को लें, ये सब बस कुछ उदाहरण हैं। दरअसल, फैसले तो लिए गए हैं, लेकिन उनके नतीजे हो सकता है अभी नहीं दिखे हों, इसमें समय लगता ही है। लेकिन पॉलिसी पैरालिसिस जैसा कुछ नहीं। जहां तक स्पूक्ड या भूत बना देने का जुमला है, इस पर मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा।

अगले साल आप कोई बदलाव करेंगे या इन्हीं नीतियों पर चलना चाहेंगे?
मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि किसी ने मुझसे पूछा था कि मैं किसके प्रति निर्दयी बन रहा हूं और किसके प्रति उदार। मैंने इस पर काफी सोचा और इस नतीजे पर पहुंचा कि मैं अपने प्रति ही निर्दयी बन रहा हूं, क्योंकि मैं 41 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व हासिल कर रहा हूं, लेकिन उसका पूरा फायदा मुझे ही नहीं मिल रहा है। मुझे इसका 32 फीसदी हिस्सा राज्यों को दे देना होगा। लेकिन जहां तक आलोचना का मामला है, यह 101 प्रतिशत मेरी ही होगी। तो मैं अपने प्रति निर्दयी हूं और दूसरों के प्रति उदार।

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