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पान, पीक और साहित्य

पान और साहित्य का संबंध जन्म-जन्मांतर का है। पिछले जन्म में ‘पान योनि में पैदा हुआ पत्ता इस जन्म में साहित्य कहलाया। चाहें तो अंतरानुशासनिक शोध करके देख लें।’

जब तक पान रहा, तब तक साहित्य रहा। पान के न रहने पर साहित्य भी नहीं हुआ। पान के बिना साहित्य जी नहीं पाया। साहित्य का संकट मूलत: पान संकट है। दरबार होता था, तो पान का बीड़ा होता था। वीर योद्धा बीड़ा उठाते। बादशाह गिलौरी दबाते। सभा में बैठे कवि जन भी गिलौरी नोश फरमाते। गाल में एक ओर पान दबाकर कविता होती। छंद होता, साहित्य में रस बरसता। दरबार गए। पान गया। बीड़े का पता नहीं। पान गया, मानो साहित्य का मान गया।

पान परंपरा था। जहां पान रहा, वहां साहित्य रहा। दरबार से निकला पान सड़कों-चौराहों पर आ गया। पान भंडार खुल गए। पान कमर्शियल हो गया। बिहार से पान हटा लीजिए, तो साहित्य खत्म। बिहार सर्वाधिक साहित्य-प्रेमी है, क्योंकि वहां की जनता पान-प्रेमी है। यूपी में साहित्य पनपा, क्योंकि पान पनपता रहा। बनारस पान का केंद्र बना तो साहित्य का केंद्र बना। इलाहाबाद, लखनऊ, मध्य प्रदेश, राजस्थान सर्वत्र पान और साहित्य का अभिन्न संबंध सिद्ध है।

गलत कहते हैं पंतजी कि ‘वियोगी होगा पहला कवि।’ सही यों है, ‘पान-प्रेमी होगा पहला कवि, पान से उपजा होगा गान, निकलकर होठों से चुपचाप, बहा होगा बन पीक महान।’

पीक सकल सार्वजनिक अभिव्यक्ति है। हिंदी क्षेत्रों में यत्र-तत्र-सर्वत्र यह अभिव्यक्ति छपी नजर आती है। चबूतरों पर, दीवारों पर, कानों में, सीढ़ियों पर, बाथरूमों में, शौचालयों में, घर के कोनों में, बैठकखानों में, इसकी काव्य छटा कभी पीकदान में नहीं समाई।

पान ‘साहित्य’ का सांगरूपक है। सामाजिक यथार्थ का चूना राजनीतिक कत्थे में विचारधारा की उंगली से देर तक रगड़कर रचा जाता है। सुपाड़ी के छंद में नब्बे नंबर के जर्दालंकार और किमाम का पुट देकर जब पान मुखाग्र होता है, तो रस का पूर्ण परिपाक होता है।

पान सेवी पहुंचे हुए साहित्य सेवी की तरह मन ही मन मगन रहता है। लाख कौंचिए, वह बोलता ही नहीं। जैसे गूंगे का गुड़ अंतर्गत ही भाता है। वह पान योगी होता है। मितभाषी होता है। बोलता है, तो सामने वाले के कपड़े ‘डिजाइनर’ के बना देता है। साहित्य योगी की तरह वह मर्म को चुगलाता रहता है।

साहित्य पर संकट आया, तो पान के कारण। भूमंडलीकरण ने सबसे पहले पान से दुश्मनी ठानी- पान पर प्रतिबंध लगा दिया, दफ्तर-दफ्तर शीशा कर दिया, पीक कहां मारें? साहित्य की अभिव्यक्ति इसी कारण अवरुद्ध हुई। पान समाजवादी मिजाज का रहा है। वह लाल रंग का सहज प्रचारक है। प्रगतिशील आंदोलन के पीछे पान था। कहते हैं कि साहित्य की तेज प्रगति को देखकर सीआईए के षड्यंत्रकारियों ने पान के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष किया। पान की दुकानें बंद हो गईं। ‘गुटखा’ लटकने लगा। लोग पान छोड़कर ‘प्लास्टिक पाउच’ का सेवन करने लगे। अब न रहे वे खाने वाले, अब न रहे वे पान लगाने वाले।

पिछले 20 साल में पान का स्पेस कम हुआ। यही साहित्य के स्पेस के कम होने के दिन हैं। एक बार अकबर बादशाह ने बीरबल से सवाल किया- घोड़ा अड़ा क्यों? पान सड़ा क्यों? बीरबल ने जवाब में कहा- ‘फेरा न था।’
समझ रहे हैं न! पान खाते रहे। साहित्य  खाते रहे। ‘फेरना’ भूल गए! पान सड़ा, तो साहित्य भी सड़ गया।

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