DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

छात्र आंदोलन से ‘छात्र’ ही रहे गायब

डेढ़ दशक बाद बीएचयू परिसर में एक शब्द फिर सुनाई दिया, ‘छात्र आंदोलन।’ एक मुद्दा लेकर 40-50 युवक सड़क पर उतरे, नारेबाजी की, धरना-प्रदर्शन किया और गिरफ्तारी हो गई। इस पूरी भीड़ में काफी कुछ था, नहीं दिखा तो बस ‘छात्र’। एक राजनीतिक दल के फ्रंटल संगठन के पदाधिकारियों ने इस मुहिम की बागडोर संभाली। कुछ पुराने छात्रनेता भी अपने दिनों की यादें ताजा करने के लिए जुटे। इस पूरे मामले बीएचयू प्रशासन भी गैर जिम्मेदाराना रुख अपनाने के आरोपों से घिर गया।

गुरुवार की शाम करीब 200 युवा लंका पर नारेबाजी करते निकल पड़े। मालवीय प्रतिमा के पास से संत रविदास द्वार और फिर लौटे तो बीएचयू में प्रवेश न पाकर सिंहद्वार पर ही धरने पर बैठ गए। यह ऐतिहासिक जरूर था कि अरसे बाद किसी आंदोलन के चलते सिंहद्वार छह घंटे तक बंद रहा, लेकिन समय बीतने के साथ ही भीड़ की शक्ल छोटी होती चली गई। यह चाहे जिस वजह से रहा हो। पुलिस की घेरेबंदी या फिर अपना काम पूरा हो जाना। इसकी एक वजह यह भी थी कि इस भीड़ में बीएचयू के छात्रों की संख्या काफी कम थी। रात को जब पुलिस की कार्रवाई हुई तो वहां कुछ पुराने छात्रनेता और फ्रंटल संगठन के लोग ही थे। जो पकड़े गए, उनमें भी बीएचयू के छात्र कम और संगठन के ही लोग ज्यादा थे।

बीएचयू प्रशासन ने विकास की बर्खास्तगी ऐसे समय की, जब छात्र परिषद का कार्यकाल खत्म ही होने को आया था। इस फैसले को टाला जा सकता था। इसी मसले पर कुछ लोग बीएचयू प्रशासन पर गैर जिम्मेदाराना व्यवहार करने का आरोप लगा रहे हैं। यह भी सवाल उठ रहा है कि जब प्रशासन इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार करने की बात कर रहा है, तो महासचिव के पद पर नियुक्ति कैसे कर दी गयी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:छात्र आंदोलन से ‘छात्र’ ही रहे गायब