DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भिलनी के बेर सुदामा के तंदुल

स्कूली जीवन तक आजकल बच्चा अंग्रेज रहता है। टाई, बूट, सूट आदि। जवान होते ही कानों में छल्ले डालकर अमेरिकन हो जाता है। बुढ़ापे में भारतीय होना तो उसकी नियति है। आपने कई रिटायर्ड लोगों को अंतिम दिनों में बीजेपी ज्वॉइन करते देखा होगा। अमेरिकन कल्चर ने हमारे युवा व्यवहार को स्वच्छंद बना दिया है। यह युग देवदास बनकर आहें भरने का नहीं है। अब तो कानों में छल्ले पहने, पीछे पोनी टेल बांधी, हीरो होंडा पर किक मारी कि परकटी माशूका पिछली सीट पर बैठी मिलती है। दोनों ने एक-दूसरे से हाय, हाय की और फुर्र..। मैंने एक दिन एक बालिका को अपने स्कूटर से उसके घर छोड़ा, तो वह थैंक्यू चाचाजी कहकर चली गई। दिल के अरमा आंसुओं में बह गए। मैं स्वयं को शांत करने मंदिर गया। भगवान कुछ खिन्न से लगे। बोले- फिर वही भिलनी के बेर, सुदामा के तंदुल, जग के स्वामी को यही भोग लगाते रहोगे? भक्त और भगवान का भोग अलग-अलग क्यों?

पिछली होली की पीनक में कामना ने जोर मारा, सो मैं शर्माजी की पत्नी के साथ चुहलबाजी करने लगा। बोला- भाभी देवर का तो हक है। भाभी तुनकी। तड़ से बोली- अरे हटो। कुंवारे देवर के लिए हर भाभी मां के बराबर होती है। तभी मुझे ज्ञान हुआ कि मैं गोपनीय ढंग से कुंवारा हूं। बुढ़ापे में हमारी इच्छाएं तो बढ़ जाती हैं, पर उन्हें पूरा करने की ताकत नहीं रहती। वैसे कई नेताओं पर यह संहिता लागू नहीं होती। मेरे एक ठरकी मित्र परिवार नियोजन विभाग में थे। पांच बेटों और दो बेटियों के बाद रिटायर हो गए। जाते-जाते विभाग के विज्ञापन पट पर लिखवा गए- सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

कुछ दिन पहले मैंने एक वयोवृद्ध जोड़े को देखा। प्रेमिका वृंदावन की विधवा लग रही थी। प्रेमी वृद्धाश्रम से आए थे। बोले- तुम्हारा गठिया कैसा है? बोली- तुम्हारी चीनी कितनी निकली? बोले- तुम्हारी किडनी तो ठीक है न? मुझे यह मेडिकल वार्तालाप जवानी के प्रेमालाप से कहीं ज्यादा सच्चे, ईमानदार और मैच्योर लगा।
कभी मैं भी वेलेंटाइन डे मनाता था। अपने को कृष्ण-कन्हैया समझता था। शादी हुई। पत्नी को देखा। मन को समझाया, चलो, राधा न रही रुक्मिणी सही।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:भिलनी के बेर सुदामा के तंदुल