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कहां बदली माकपा..

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों में से एक है तथा सिमटते जनाधार के बावजूद भारत के राजनीतिक-पटल पर उसका प्रभाव है, लेकिन मौजूदा वक्त उसके राजनीतिक इतिहास का सबसे कठिन दौर भी है। बंगाल और केरल के विधानसभा चुनावों में हार, लोकसभा में कमजोर स्थिति तथा माकपा समर्थित मजदूर व कर्मचारी संगठनों का कमजोर होना आदि ऐसे कारक हैं, जिनके कारण पार्टी का राष्ट्रीय राजनीति में दखल कम हुआ है। ऐसे में, यह संभावना थी कि पार्टी संगठन और देश के हालात पर खुलकर आत्म-मंथन करेगी, लेकिन माकपा के कोझिकोड सम्मलेन में ऐसा कुछ नहीं हुआ। आश्चर्य की बात है कि जिन सवालों को अन्ना हजारे, रामदेव, सुब्रमण्यम स्वामी या जनरल वी के सिंह उठा रहे हैं, उन पर माकपा की राजनीति बस टिप्पणी करने तक सीमित रह गई है। हद देखिए, यूपीए-एक के समय परमाणु समझौते पर जमीन-आसमान एक कर देने वाली और महाराष्ट्र के जैतापुर में प्रस्तावित न्यूक्लियर संयंत्र के विरुद्ध आंदोलनरत पार्टी तमिलनाडु के कोडनकुलन के न्यूक्लियर संयंत्र को खुला समर्थन दे रही है।

कोझिकोड सम्मलेन से एक निराशाजनक पहलू यह भी सामने आया है कि पार्टी पर अब भी बूढ़े कॉमरेडों का दबदबा है। प्रकाश कारत के नेतृत्व में निर्वाचित पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमिटी के सदस्यों में लगभग सभी पुराने चेहरे हैं, युवाओं की संख्या नगण्य है।  
बरगद में प्रकाश के रे

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