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हथियारों का निर्यात

नोडा सरकार ने दिसंबर 2011 में एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए हथियार निर्यात न करने की जापान की चिर पुरानी नीति को लचीला बना दिया था और अब उस कदम को पुख्ता आधार देने के लिए प्रधानमंत्री योशिहिको नोडा ने 10 अप्रैल को जापान के दौरे पर आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री के साथ मिलकर साझा हथियार बनाने की योजना पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी। ऐसा पहली बार हुआ है, जब अमेरिका के अलावा किसी अन्य देश के साथ मिलकर हथियार विकसित करने के लिए जापान राजी हुआ है। जापान हथियार संबंधी टेक्नोलॉजी अमेरिका को देने और उसके साथ मिलकर रक्षा मिसाइलें तैयार करने को 1983 और 2004 के प्रतिबंधों के अपवाद के रूप देखता रहा है। ऐसे में, ब्रिटेन के साथ मिलकर हथियार बनाने का नोडा का फैसला निहायत आपत्तिजनक है। यह हमारे संविधान की युद्ध विरोधी भावना और सिद्धांतों के साथ धोखा है, जो यह कहता है कि ‘जापानी जनता किसी देश के संप्रभु अधिकार के रूप में युद्ध को अमान्य करती है और अंतरराष्ट्रीय विवादों को निपटाने के लिए फौज या धौंस के इस्तेमाल को नकारती है।’ नोडा और डेविड कैमरन ने किसी खास हथियार के विकास को लेकर चर्चा नहीं की, बल्कि उन्होंने हेलिकॉप्टरों के लिए रॉल-रॉयस इंजन टेक्नोलॉजी के बारे में बात की। अपने साझा वक्तव्य में दोनों नेताओं ने कहा कि वे यह सुनिश्चित करेंगे कि हमारी हथियार टेक्नोलॉजी किसी अन्य देश के हाथ न लगे। और न ही रक्षा उपकरणों के अलावा किन्हीं अन्य उद्देश्यों के लिए इनका इस्तेमाल हो। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि जापान इतना सख्त तंत्र विकसित कर ही लेगा, जो इस संकल्प को अचूक रूप से लागू कर सके। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यदि हेलिकॉप्टर आधुनिक हथियारों से लैस होंगे, तो वे जानलेवा बन जाएंगे। दुनिया भर में जापान की इस बात के लिए तारीफ की जाती है कि उसने हथियारों के निर्यात पर आत्म-प्रतिबंध लगा रखा है। हथियारों के निर्यात पर प्रतिबंध को लचीला बनाना आर्थिक रूप से भले ही लाभप्रद हो, पर इससे जापान की छवि को गहरा धक्का लगेगा।
द जापान टाइम्स 

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