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अंधविश्वासी शिक्षक

अंधविश्वास की वास्तव में कोई सीमा नहीं होती, लेकिन जब पढ़ा-लिखा तबका भी इसकी चपेट में आ जाता है, तो तकलीफ होती है। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में दूसरी कक्षा का एक छात्र परीक्षा देने गया, तो क्लास टीचर ने उसको परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। ऐसा जब दो दिन हुआ, तो बच्चे का पिता परेशान होकर स्कूल पहुंचा और बच्चे को परीक्षा में न बैठने देने का कारण पूछा। कारण सुनकर उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई। टीचर ने कहा कि अभी दो-तीन दिन पहले ही बच्चे के दादा का देहांत हुआ है और आपके घर में सूतक लगा हुआ है। इससे बच्चा अशुद्ध हो गया है और अशुद्ध बच्चे को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती। बच्चे को शिक्षा देने वाला शिक्षक ही अंधविश्वास के भंवर में फंसा हो, तो वह भला बच्चों को क्या शिक्षा देगा? ऐसे अंधविश्वासी अध्यापकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और ऐसा करने की हिमाकत न कर सके।
इंद्र सिंह धिगान, रेडियो कॉलोनी, किंग्जवे कैंप, दिल्ली

सुस्त ही नहीं अधूरा भी
पिछले दिनों प्रकाशित ‘सुस्त इंसाफ’ शीर्षक संपादकीय पढ़ा। उसमें लिखा गया था कि राजनीति में मौजूद स्वार्थी तत्व सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल सियासी हथियार की तरह करते हैं और उसे रोकने के लिए तेज व प्रभावी न्यायिक प्रक्रिया होनी चाहिए। परंतु यह ‘तेज’ और ‘प्रभावी’ कैसे होगी, इसके बारे में कुछ भी सुझाया नहीं गया है। न्यायिक प्रक्रिया तो पूर्णत: सबूतों पर निर्भर करती है। राजनीति में मौजूद तत्व अपनी कारस्तानियों का कोई सबूत नहीं छोड़ते और वर्षो बाद भी वे कानून की पकड़ में नहीं आते। इसलिए इंसाफ न केवल सुस्त होता है, वरन सबूत न होने की वजह से अधूरा भी होता है।
एस एन कुंदरा

म्यांमार में बदलती हवा
पड़ोसी देश म्यांमार से कुछ अच्छी खबरें आ रही हैं। वहां हाल ही में हुए उप-चुनावों में पहले तो लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की को भाग लेने की इजाजत दी गई और अब लगभग निन्यानबे फीसदी सीटों पर उनकी पार्टी की जीत के आसार से यह साफ हो गया है कि म्यांमार की फौज समर्थित सरकार लोकतंत्र को आहिस्ता-आहिस्ता रास्ता दे रही है। हम रातोंरात क्रांति की उम्मीद नहीं करते, लेकिन यदि यही रुख बना रहा, तो जल्दी ही म्यांमार में पूर्ण लोकतंत्र होगा। इसके लिए हमें आंग सान सू की की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने तमाम यातनाओं को सहते हुए भी धैर्य के साथ अपना संघर्ष जारी रखा और तानाशाह हुकूमत को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। अब हमें भी अंतरराष्ट्रीय जगत से बर्मा को भरपूर इमदाद दिलाने की कोशिश करनी चाहिए। पड़ोस में यदि सुख-शांति हो, तो उसका लाभ भी मिलता ही है।
दीपक सहगल, मुखर्जी नगर, दिल्ली-9

नशे के सौदागर
नंदनगरी में अवैध रूप से नशीली चीजें खुलेआम बिक रही हैं। पूरे क्षेत्र को नशे के सौदागरों ने नशीली वस्तुओं का अड्डा बना दिया है। कहने की जरूरत नहीं कि पुलिस के संरक्षण के बगैर इस तरह के कारोबार फल-फूल नहीं सकते। दरअसल, यह धंधा नंदनगरी की झुग्गियों में चल रहा है। नशीली वस्तुओं की अवैध बिक्री से यहां के सैकड़ों घर बर्बादी की ओर हैं और हजारों लोग मौत के मुंह में फंस गए हैं। शरीफ लोगों का जीना मुश्किल हो गया है। दिल्ली पुलिस आयुक्त से अनुरोध है कि वह स्मैक के धंधे में लिप्त लोगों के खिलाफ शीघ्र व कठोर कार्रवाई करें।
प्रेम सागर, नंदनगरी, दिल्ली

 

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