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जलियांवाला ने बदल दी इतिहास की धारा

तेरह अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश जनरल डायर द्वारा किए गए हत्याकांड से केवल ब्रिटिश औपनिवेशिक राज की बर्बरता का ही परिचय नहीं मिलता, बल्कि इसने भारत के इतिहास की धारा को ही बदल दिया। इतिहास में 1919 तीन बातों के लिए याद किया जाता है। पहली, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को लागू करना। दूसरी, रॉलेट प्रस्तावों के विरुद्ध महात्मा गांधी की अखिल भारतीय हड़ताल व तीसरी, जलियांवाला बाग का बर्बर कांड।

1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश राज की सजा व पुरस्कार नीति के तहत जिस प्रकार आम भारतीयों का दमन और सामंत वर्ग को माफी तथा पुरस्कार मिले, उसने आम भारतीयों में सामंती निष्ठा समाप्त कर राष्ट्रवाद की भावना भर दी। इसी की एक परिणति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना थी। भारत के नए उभरते अंग्रेजी-भाषी उच्च मध्यम वर्ग का वास्तविक उद्देश्य आम भारतीयों को सत्ता दिलाना नहीं, बल्कि अपने लिए सत्ता में भागीदारी प्राप्त करना था। इसीलिए जुलाई 1918 में जब मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, तो सत्ता-हस्तांतरण के सवाल पर कांग्रेस दो फाड़ हो गई थी। कांग्रेस के इन दोनों समूहों के पास भी आजाद भारत के स्वरूप की कोई कल्पना नहीं थी। दक्षिण अफ्रीका में पहचान बना चुके गांधी का भारत आगमन 1914 में हो चुका था। उनके लिए सत्ता हस्तांतरण उतना महत्वपूर्ण नहीं था, जितना कि आम लोगों के दुखों का निवारण। कांग्रेस की भांति वह मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट से नहीं, रॉलेट के प्रस्तावों से इतने व्यथित थे कि उन्होंने पूरे भारत में हड़ताल का आह्वान कर दिया। राजनीतिक प्रतिरोध में समस्त भारतीयों को जोड़ने का वह आह्वान भारत के इतिहास में ऐसा पहला प्रयोग था।

जवाब में ब्रिटिश राज ने दमन का रास्ता अपनाया। छह अप्रैल की हड़ताल की सफलता से पंजाब का प्रशासन बौखला गया। पंजाब के दो बड़े नेताओं, सत्यापाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया, जिससे अमृतसर में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन जब यह खबर मिली कि आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में जमा हो रहे हैं, तो प्रशासन ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली। एक दिन पहले ही मार्शल लॉ की घोषणा हो चुकी थी। इस भीड़ पर कुल 1,650 राउंड गोलियां चलीं, 379 अहिंसक सत्याग्रही शहीद हो गए, और हजारों घायल हुए। इस बर्बरता ने भारत में ब्रिटिश राज की नींव हिला दी। पूरी दुनिया में अंग्रेजी राज की लोकतांत्रिक छवि का जनाजा निकल गया। शहरी व ग्रामीण भारत गांधी के आंदोलन के साथ हो गया। 1919 तक बाकी नेताओं का कद गांधी के समक्ष पर्याप्त बौना हो चुका था। इस कांड के बाद का राष्ट्रवाद एक नया राष्ट्रवाद था, जो एक वर्ग-विशेष नहीं, पूरे भारत की आम जनता तक सत्ता पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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