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बलिहारी बॉस सामने क्यों न लागूं पांय

उस दिन बीबी जागीर कौर के पांव छूने वाले जेलकर्मियों को देखकर मुझे हंसी आ गई, तो एक मित्र तुनक गए। बोले, ‘चरण स्पर्श पर इतने भौंचक क्यों होते हो भला? कुछ लोगों की पर्सनैलिटी ही ऐसी होती है कि उन्हें देखते ही पैर छूने का मन करने लगता है। नजरें चरणोन्मुख होने लगती हैं और दूर से ही लक्ष्य साफ दिखाई पड़ने लगता है। सच्चा साधक भला कब अपने साधन से डिगता है। उसे तो बस साध्य ही दिखाई पड़ता है।’

मेरे मित्र का फंडा इस मामले में बड़ा क्लीयर है, ‘दुनिया में दो तरह के संस्कारी पुरुष होते हैं। एक वे, जो अपने बॉस को नित-प्रतिदिन नमस्कार करते हैं और दूसरे वे, जो सामने टकरा जाने पर नमस्ते करते हैं।’ पहली श्रेणी के लोग एडवांस वर्जन में गिने जाते हैं। दफ्तर में घुसते ही सीधे बॉस के पास जाते हैं और तब तक स्टैचू बने रहते हैं, जब तक फाइलों में सिर घुसाया बॉस अपनी नजरें ऊपर न कर ले। आंखें चार होते ही मित्र कबूतर स्टाइल में गर्दन झुकाते हैं। परेड की मुद्रा में पीछे मुड़ते हैं और तीर की तरह अपनी सीट पर लौट जाते हैं। वे पूरे नियम से सालों भर इसी तरह अभिवादन कर्म करते हैं और फल की चिंता नहीं करते। इस दौरान वहां मौजूद कुछ लोगों के चेहरे पर मुस्कान की रेखा फैल जाती है, लेकिन उन्हें परवाह नहीं।

पिछले दिनों छुट्टी से लौटने पर बॉस को केबिन में न देखकर वह बेचैन हो गए। केबिन को ही मन ही मन चरण स्पर्श किया और दफ्तर से लौटते वक्त बॉस के घर पहुंच गए। दरवाजा खुलते ही गड़ाप से चरणों में हाथ घुसा दिया। इसके बाद बॉस की पत्नी की बारी थी। लाख नहीं-नहीं करती रहीं, लेकिन वह ठहरे धुन के पक्के। उनके संकोच को भेदकर उनके चरणों में भी गड़ाप। यह देख बॉस की बेटी दहशत में आ गई। उसने झट से अपने दोनों पांव ऊपर उठाकर सोफे में छिपा लिए। मैं उन्हें लाख समझा रहा हूं कि मैं उनसे सहमत हो गया हूं, पर वह मेरे संस्कार सुधरने को लेकर आश्वस्त नहीं। बीबी जागीर कौर की चरण-वंदना को लेकर मेरे सेन्स ऑफ ह्यूमर से वह खासे दुखी हैं। जैसे वह यही कह रहे हों- हे ईश्वर, इसे माफ करना, यह नहीं जानता कि ये क्या कह रहा है।

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