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भय और अधिक भय

तब हम सऊदी अरब में रहते थे। बब्बन मियां मेरे बच्चों के प्रिय ड्राइवर थे और उनके मित्र भी। हम प्राय: उन्हें ही साथ लेकर खरीदारी के लिए पास के शहर जाते। एक दिन मैं कुछ सामान की सूची ले पास के शहर खरीदारी करने चली गई। एक दुकान में कुछ सामान नहीं मिले, तो बब्बन मियां यह कहकर पास की दुकान में चले गए कि मैं दो-एक दुकान में इन्हें ढूंढ़कर आता हूं, तब तक आप यहीं बैठिए। मैं एक बेंच पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगी। तभी सामान ले लदा एक ट्रक आकर दुकान के सामने रुका। हिंदी बोलने वाला वह दुकानदार एकदम से बोला, ‘मैडम, अरबी लोग सामान देने आ रहे हैं, अब आप यहां अकेली कैसे बैठ सकती हैं? आप तो भारतीय हैं, आपको अकेली देखकर वे आपत्ति करेंगे।’..मैं दुकानदार की बातें सुन भयभीत हो जाती हूं। अपना चेहरा दुपट्टे से ढकने लगती हूं। फिर मैं यह सोचते हुए दुपट्टा झटककर खड़ी हो जाती हू कि यह मैं क्या कर रही हूं? सत्तर वर्ष पहले जो मां ने नहीं किया, वह मैं क्यों करने जा रही हूं? बारह वर्ष की मां यदि पूरे गांव व ससुराल से विद्रोह कर सकती थीं कि वह घूंघट नहीं करेंगी, तो क्या उनकी बेटी करेगी?..किंतु यह अंधेरा क्यों है? मैं आंखें मलती हूं, तो खिड़की के बाहर चांद चमक रहा है। ठंडी समुद्री हवा मेरे गाल सहला रही है। यह तो ठेठ मुंबइया हवा है। यहां मुझे किसी सूरत का भय नहीं है। मैं वर्षों पहले की घटना में डूब गई थी। मुंबई में तो मैं आजाद हूं। मैं बाहर आने-जाने को स्वतंत्र तो हूं। किंतु अकेले जाने को?
घुघूती बासूती से

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