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दावत से आगे

रविवार को जब भारत और पाकिस्तान के नेता नई दिल्ली में दोपहर की दावत पर मिले, तो कोई नाटकीय नतीजा नहीं निकला। इन दोनों देशों के रिश्तों का जो इतिहास है और उस पर हमेशा जो खतरा मंडराता रहता है, उसे देखते हुए सात साल बाद किसी पाकिस्तानी शासन प्रमुख की भारत यात्रा रिश्तों के सुधरने का एक छोटा-सा संकेत तो है ही। भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, दोनों को यह श्रेय देना ही चाहिए कि उन्होंने परमाणु शक्ति संपन्न देशों के रिश्तों को सुधारने का गंभीरता से प्रयास किया। सेना की मदद हासिल करने वाले पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन के मुंबई हमले के बाद यह डर था कि हालात काबू से बाहर निकल सकते हैं। लेकिन भारत की इस बात के लिए सचमुच तारीफ करनी होगी कि उसने धैर्य का परिचय दिया और बदले की कार्रवाई नहीं की। लेकिन पाकिस्तान इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कठघरे में लाने में नाकाम रहा। इसके बावजूद भारत व्यापक मुद्दों पर आपसी बातचीत शुरू करने को तैयार हो गया। दोनों तरफ के कैबिनेट मंत्री और नौकरशाह अब नियमित तौर पर मिल रहे हैं। हालांकि विश्वास बहाली के लिए अब दोनों तरफ के सैनिक अफसरों और खुफिया अधिकारियों को भी मिलना चाहिए।

आपसी आर्थिक सहयोग बढ़ाने में दोनों देशों ने काफी तरक्की की है। भारत और पकिस्तान, दोनों जितना व्यापार ब्रिटेन से करते हैं, उतना आपस में नहीं करते। लेकिन अब दोनों ने आयात-निर्यात प्रक्रिया का आधुनिकीकरण, वीजा प्रतिबंधों को कम करने, तेल पाइपलाइन शुरू करने और विद्युत ग्रिड को जोड़ने की दिशा में प्रगति की है। हालांकि उन्हें अभी कई और महत्वपूर्ण मसलों पर गंभीरता से बात करनी है। जैसे अफगानिस्तान में शांति कायम करने के लिए सहयोग और कश्मीर में अमन की बहाली। इनमें सियाचिन-ग्लेश्यिर भी है, जहां पिछले दिनों 100 पाकिस्तानी सैनिक हिमस्खलन में मारे गए थे। यह घटना बताती है कि दोनों को अब सीमाओं से सैनिकों का वापस बुला लेना चाहिए।
द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका

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