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खतरे में मासूम

पिछले दिनों आई एक खबर ने दिल्ली की सुरक्षा की पोल एक बार फिर खोलकर रख दी है। अभी नए साल को आए हुए सिर्फ तीन महीने बीते हैं और इन तीन महीनों में ही राजधानी में सुरक्षा को कड़ी चुनौती देते हुए 722 बच्चों के लापता होने की बात सामने आ रही है, जिनमें से 404 नाबालिग लड़कियां हैं। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले काफी अधिक है। जब इन तीन महीनों में यह हाल है, तो फिर पूरे साल का क्या होगा? इससे यह बात साफ नजर आती है कि इन अपराधियों के तार कहीं न कहीं मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति से जुड़े हैं। यह वाकई बड़े शर्म की बात है कि दिल्ली पुलिस इन अपराधियों को पकड़ने में नाकाम हो रही है। अभी तक इस शहर में महिलाओं की सुरक्षा के उपाय ही तलाशे जा रहे थे, लेकिन इस खबर को पढ़ने के बाद तो लगता है कि देश की राजधानी में बच्चे भी महफूज नहीं हैं।
रवि श्रीवास्तव, दिल्ली

असंयमित भाषा
बुखारी साहब जब भी बोलते हैं, कुछ न कुछ विवाद पैदा हो ही जाता है। यूपी में विधान परिषद और राज्यसभा के चुनावों के मद्देनजर उन्होंने समाजवादी पार्टी से कुछ बातें कही थीं। अब उन बातों पर सपा नेता आजम खान साहब ने एतराज जताया। इस पर बुखारी साहब भड़क गए और आजम खान के खिलाफ अनाप-शनाप बोलने लगे। यह उनके कद के व्यक्ति से उम्मीद नहीं की जाती। बेहतर होगा कि वह मजहबी बातों में अपनी राय रखें। सियासत की बातें सियासतदां लोग करें, तो अच्छी लगती हैं, मजहबी लोग जब राजनीति की बातें करते हैं, तो खुद उनकी छवि खराब होती है। दुख की बात तो यह है कि बुखारी साहब इतनी-सी बात भी नहीं समझते।
राकेश शर्मा, मंडावली, दिल्ली

नक्सली समस्या का हल
ओडिशा में नक्सलियों ने विदेशी पर्यटकों व एक विधायक को कब्जे में लेकर और राज्य सत्ता को झुकाकर यह साफ कर दिया है कि सरकारी प्रबंध उनकी ताकत के सामने कितने बौने हैं। अब भी केंद्र सरकार की आंखें खुल जानी चाहिए, ताकि वह उनसे ताकत के बल पर निपटने की बजाय बातचीत की रणनीति बना सके। नक्सली समस्या का हल सिर्फ और सिर्फ बातचीत से निकल सकता है।
देवेन पंडित, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-92

पुरस्कारों की तिथियां
भारत सरकार और इसके विभिन्न मंत्रालयों की तरफ से प्रति वर्ष अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा की जाती है। इनमें से अधिकांश पुरस्कार देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए जाते हैं। विगत वर्षों में यह देखने में आया है कि कुछ पुरस्कारों को छोड़कर इनमें से अधिकांश पुरस्कार देने के लिए कोई निश्चित तिथि तय नहीं की गई है। कभी कुछ पुरस्कार जनवरी में दिए जाते हैं, तो अगले वर्ष वही पुरस्कार सितंबर में दिए जाते हैं। दुनिया में नोबेल पुरस्कार सहित जितने भी प्रतिष्ठित सम्मान हैं, उनके नामांकन, घोषित होने तथा दिए जाने की तिथियां कमोबेश निश्चित हैं। नोबेल पुरस्कार प्रति वर्ष दस दिसंबर के दिन दिए जाते हैं। राष्ट्रीय पुरस्कारों की गरिमा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उन्हें दिए जाने की एक समय सीमा हो। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में वैसे भी हमें यानी सरकारी विभागों को अपना रवैया बदलना चाहिए!
सुभाष लखेड़ा, सिद्धार्थ कुंज, द्वारका, नई दिल्ली

फिर आ गए चुनाव
लो फिर से चुनाव आ गए,
बड़े-बड़े वायदों के बादल छा गए।
जोरों-शोरों से चल रहा है प्रचार,
अब किसे देना है वोट यही कर रही 
हूं विचार।
पूनम मौर्य

 

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