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गर्भावस्था में बचें डायबिटीज से

डायबिटीज एक गंभीर बीमारी है। पर, अगर गर्भवती महिला इसकी शिकार हो जाए तो यह मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। कैसे बचें जेस्टेशनल डायबिटीज से और क्या हैं इससे जुड़े खतरे, बता रहे हैं महाराजा अग्रसेन हॉस्पिटल में कंसल्टेंट फिजीशियन और डायबिटॉलॉजिस्ट डॉ. राजीव चावला

मातृत्व को जिंदगी के सबसे सुखद अनुभवों में से एक माना जाता है, हालांकि इसकी अपनी समस्याएं हैं, जो गर्भावस्था के दौरान किसी भी महिला को परेशान कर सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज को डॉक्टरी भाषा में जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं। गर्भवती महिलाओं में दो तरह की डायबिटीज होती हैं :
जेस्टेशनल, जिसका गर्भावस्था के दौरान पता चलता है और प्रीजेस्टेशनल या गर्भ धारण करने से पहले से होने वाली डायबिटीज। 20 में से 1 गर्भवती महिला को डायबिटीज होती है। आमतौर पर गर्भावस्था के 13 से 28 सप्ताहों के दौरान यह बीमारी होती है और गर्भावस्था के साथ दूर हो जाती है। हार्मोन में बदलाव और वजन बढ़ना स्वस्थ गर्भावस्था के लक्षण हैं, पर ये बदलाव कभी-कभी शरीर पर बुरा असर डालते हैं।

जेस्टेशनल डायबिटीज में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है। जब हार्मोन में बदलाव की वजह से गर्भवती महिला के शरीर में इंसुलिन के उपयोग की क्षमता प्रभावित हो जाती है तो वह डायबिटीज की शिकार हो जाती है। बहुत लोग इस तथ्य से अनजान हैं कि गर्भवती महिला के लिए डायबिटीज अधिक खतरनाक है। इससे बच्चे का आकार और वजन दोनों ज्यादा हो सकता है। सामान्य डिलीवरी में मुश्किल आ सकती है। डायबिटीज पर काबू न रहे तो डिलीवरी के बाद बच्चे को सांस की तकलीफ भी हो सकती है, उसका शुगर लेवेल बढ़ सकता है और उसे पीलिया भी हो सकता है।

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