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सुस्ती और देरी से लड़ती फौज

भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखी अपनी चिट्ठी में सेना की युद्धक क्षमताओं में जिस महत्वपूर्ण कमी का जिक्र किया, उसे लेकर पूरा देश चिंतित है। लोगों को यह लग रहा है कि देश के राजनेता और नौकरशाह हमारी सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं।

रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने दो अप्रैल को डिफेंस एक्वीजीशन कौंसिल (डीएसी) यानी सुरक्षा खरीद परिषद की एक बैठक बुलाई थी। यह बैठक उस 15 साल की भावी योजना पर विचार के लिए थी, जो ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है। रक्षा मंत्री चाहते थे कि एक्वीजीशन कौंसिल सेनाओं के मुख्यालयों को सैनिक साजो सामान खरीदने के लिए और वित्तीय शक्तियां दे। यह माना जा रहा है कि इससे रक्षा सामग्री की खरीद की सुस्त पड़ गई रफ्तार तेज की जा सकती है।

थल सेना इस समय गंभीर समस्याओं से गुजर रही है। इसके टैंक रेजिमेंट्स के पास जरूरी गोला-बारूद नहीं हैं, जबकि मौजूदा हवाई रक्षा प्रणाली का 97 फीसदी तक हिस्सा गुजरे जमाने का है। कुछ अनुमानों के हिसाब से भारत अगर इन खामियों को पार पाना चाहता है, तो उसे तुरंत 41,000 करोड़ रुपये की जरूरत है। इसके बाद भी भारतीय सेना को अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करने में तकरीबन 15 साल लग ही जाएंगे।

इस मामले में सेना की अपनी खामियां भी बहुत कुछ बता देती हैं। अपने सैनिकों की जरूरतों का ब्योरा बनाने में देरी और खरीद में सुस्ती के बाद मैदानी परीक्षण को टालने जैसे इसके कई उदाहरण हैं। लेकिन इस मामले में रक्षा मंत्रलय भी आरोपों से बच नहीं सकता, क्योंकि इस वक्त हथियारों की खरीद की लगभग सौ परियोजनाएं इसके दफ्तर में अटकी पड़ी हैं।

दुनिया के किसी भी राष्ट्र के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह अपनी युद्धक क्षमता को सुधारने के लिए 70 फीसदी रक्षा उपकरण विदेश से आयात करे। पंचवर्षीय रक्षा योजना बनाने और उसे लागू करने का भारत का रिकॉर्ड बहुत खराब है। वास्तव में, रक्षा उपकरण बनाने वाली भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां बहुत ज्यादा अकुशल हैं। निजी क्षेत्र के पास इसकी क्षमता भी है और काबिलियत भी, लेकिन हथियारों के उत्पादन से इसे दूर रखा जाता है।

रक्षा सामग्रियों, हथियारों, उपकरणों और प्रणालियों की खरीद में देरी के कुछ बड़े उदाहरणों से इसे ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है कि इस काम में समस्याएं किस तरह की हैं। और इसका सबसे अच्छा उदाहरण है- नालंदा परियोजना। बिहार के नालंदा जिले में इस परियोजना की नींव तकरीबन 19 साल पहले रखी गई थी। एक इजरायली कंपनी ने नालंदा ऑर्डिनेंस फैक्टरी के लिए मार्च 2009 में 174 करोड़ रुपये का निवेश भी किया था। लगभग दो दशक होने को आ गए, पर इस परियोजना का 27 फीसदी काम ही अभी पूरा हुआ है। लोक लेखा समिति ने बताया है कि परियोजना में देरी के कारण 628.87 करोड़ रुपये का चूना लगा है।

ऐसा दूसरा उदाहरण है होवित्जर तोपों की खरीद का। सेना में तैनात पुरानी पड़ गईं बोफोर्स एफएच-77बी तोपों की जगह लेने के लिए 155 मिलीमीटर वाली होवित्जर की खरीद होनी थी। पहले सेना ने जिस तरह की होवित्जर की खरीद के लिए टेंडर जारी किए, हकीकत में वैसे हथियार कहीं उपलब्ध ही नहीं थे। इस वजह से इस टेंडर को ही वापस लेना पड़ा। कई परीक्षणों के बाद फिर से टेंडर जारी किए गए। इसमें दो कंपनियां आपूर्ति की सबसे बड़ी दावेदार बनकर सामने आईं- एक सिंगापुर टेक्नोलॉजी काईनेटिक और दूसरी, रीनमेंटेल एयर डिफेंस। लेकिन 2009 में ऑर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड में हुए भ्रष्टाचार के एक  मामले में इन दोनों ही कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। इसके साथ ही यह सौदा भी लटक गया। इस सौदे के पूरा न होने के कारण सेना की आर्टिलरी शाखा की क्षमता पर काफी असर पड़ा है।

एक और उदाहरण है टैंकों की खरीद का। सेना ने अपनी 59 बख्तरबंद रेजीमेंट्स के लिए 1,657 टी-90 टैंक खरीदने का फैसला किया। इसमें से एक हजार टैंक भारत में बनने थे। लेकिन यह परियोजना ही बैठ गई। दरअसल, टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण का मामला ऐसा लटका कि बात आगे बढ़ ही नहीं पाई। इस बीच सेना को 100 अजरुन टैंक काम चलाने के लिए भेजे गए, लेकिन इनसे बात नहीं बनी। इसके बाद कोशिश यह की गई कि टी-72 टैंकों को ही अपग्रेड कर दिया जाए, लेकिन यह मामला भी आगे नहीं बढ़ सका। इसके लिए 125 मिलीमीटर का जो बैरल भारत में बनाया गया, वह परीक्षण के दौरान फट गया। इससे सेना पर यह दबाव बना कि वह आपातकालिक स्थिति में बैरल का आयात करे, लेकिन यह आयात अब भी नहीं हो सका है। इसी तरह की एक और समस्या सेना के पुराने पड़ चुके चेतक तथा चीता हेलीकॉप्टरों के साथ भी आई। इनकी जगह नए किस्म के हेलीकॉप्टर आने थे, लेकिन यह काम भी अब तक नहीं हो सका है।

हथियारों की खरीद में एक बड़ी समस्या है, इसमें होने वाली लंबी देरी। रक्षा मंत्रालय ने एक फास्ट ट्रैक कार्यक्रम बनाया है, जिसका मकसद है कि जरूरी रक्षा सामग्री को एक साल के अंदर ही खरीद लिया जाए। लेकिन इस कार्यक्रम के तहत जो सामान खरीदे गए, उन्हें भी आने में चार साल का समय लग गया। सेना के अंदर की गुटबाजी, हथियार और सुरक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियों के कानूनी दांव-पेच और रक्षा उत्पादन व्यवस्था का काम न करना, इसके प्रमुख कारण हैं। इन सबके अलावा भ्रष्टाचार तो एक कारण है ही।

रक्षा मंत्रालय सैनिक साजो-सामान के उत्पादन की परियोजनाएं संयुक्त क्षेत्र में लगाने के लिए दबाव बनाने में नाकाम रहा है। इस काम के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत भी दी जा सकती थी। ऐसा होता, तो हमें टेक्नोलॉजी भी हासिल होती, देश में उत्पादन का आधार तैयार होता और सेना में भी एक प्रकार का आत्मविश्वास पैदा होता। आखिरकार चीन ने हथियारों को अपने देश में ही बनाने का काम सफलता के साथ किया ही है। भारत को भी इसी रास्ते पर बढ़ना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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