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ढहती हुई संस्कृति

कुमाऊं की रामलीला चर्चित रही है। देश को अनेक बड़े रंगकर्मी इस रामलीला ने दिए। बी एल शाह, बी एम शाह, मोहन उप्रेती जैसे कलाकारों ने रामलीला में ही अपनी आरंभिक दीक्षा ली थी। जब मैं दिल्ली में था, तो बार-बार रामलीला की याद आती थी। हल्द्वानी आया तो मन में बड़ी उमंग थी इन रामलीलाओं को देखने की। आप कहेंगे कि इस मौसम में रामलीला! कुमाऊं में चैती नवरातों में भी रामलीलाएं होती हैं। दूर-दूर के गावों से पैदल चलकर लीला देखने आने वालों के लिए भी यह मौसम सुविधाजनक होता है। खैर, एक दिन मैं पत्नी के साथ रामलीला स्थल पर पहुंच गया। जिस लीला का हम इंतजार कर रहे थे, अंतत: वह शुरू हुई। पर जल्दी ही मालूम हुआ कि आयोजकों में दर्शकों के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं है। दो मिनट का सीन और फिर पटाक्षेप। कोई सूत्रधार नहीं। दृश्यों के बीच कोई तालमेल नहीं। इससे लाख गुना अच्छी रामलीला तो 40 साल पहले मेरे गांव में होती थी। कोई साधन नहीं, लालटेन जलाकर मंच पर उजाला किया जाता, फिर भी हर चीज व्यवस्थित होती थी। बहरहाल, घंटा भर ‘लीला’ देखने के बाद लगा कि इसका हाल भी दिल्ली की नौसिखिया रामलीला जैसा ही है। लेकिन यहां तो इसका समृद्ध समाज है! फिर ऐसा क्यों? लगा कि हमारी संस्कृति को जैसे घुन लग गया है। लोग तो ऐसे आयोजनों में जाना चाहते हैं, पर आयोजक सब कुछ भूल गए हैं। हम इस रामलीला के आयोजकों को कोसना नहीं चाहते, पर दर्शकों का सम्मान तो उन्हें करना ही चाहिए।
हल्द्वानी लाइव में गोविंद सिंह

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