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सुनामी की चेतावनी

इंडोनेशिया के पास समुद्र में आए ताकतवर भूकंप से किसी बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान की खबर नहीं है। यह इसलिए भी राहत की बात है, क्योंकि भूकंप काफी ताकतवर यानी रिक्टर पैमाने पर 8.6 तीव्रता का था। 26 दिसंबर, 2004 को इसी इलाके में 9.1 तीव्रता का भूकंप आया था और इससे भारत समेत कई देशों में भारी तबाही हुई थी और तकरीबन 2,30,000 लोग मारे गए थे। 9.1 और 8.6 तीव्रता में काफी फर्क है, क्योंकि भूकंप की तीव्रता की गणना का तरीका अलग होता है, मसलन पांच तीव्रता के भूकंप में चार तीव्रता के भूकंप के मुकाबले धरती को कंपाने की क्षमता दस गुना ज्यादा होती है और उसमें लगभग 32 गुना ज्यादा ऊर्जा होती है। लेकिन आठ तीव्रता से ऊपर के हर भूकंप को खतरनाक माना जाना चाहिए और यह गनीमत ही है कि उससे भारी नुकसान नहीं हुआ। भारत में भी हिंद महासागर के तटीय इलाकों में सुनामी के लिए निगरानी का आदेश जारी कर दिया गया था, हालांकि मौसम विभाग ने सुनामी की चेतावनी नहीं जारी की थी। भारत में सुनामी का खतरा तो टल गया है और सौभाग्य से इसके हलके झटके महसूस करने और समुद्र में ऊंची लहरें उठने के अलावा इसका कोई प्रभाव नहीं देखने में आया है। इसकी वजह शायद यह है कि भूकंप का केंद्र समुद्र की गहराई में 33 किलोमीटर नीचे था तथा इस भूकंप के बाद और झटके नहीं आए, हालांकि अक्सर शक्तिशाली भूकंप के बाद कई झटके आते हैं। इस भूकंप ने यह तो जता दिया है कि वर्ष 2004 की सुनामी को हम भुला नहीं सकते, क्योंकि इस क्षेत्र में भूकंप का अर्थ यह है कि दूर-दूर तक सुनामी का खतरा। पिछले वर्ष जापान में ऐसे ही भूकंप और सुनामी का असर हम देख चुके हैं।

भूकंप या सुनामी की भविष्यवाणी तो अब तक मुमकिन नहीं हो पाई है, लेकिन उससे जान-माल का नुकसान न हो, इसके लिए तैयारी करना इंसान के बस में है। 2004 की सुनामी से तमाम देशों ने सबक सीखे हैं। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनामी की चेतावनी देने वाले केंद्र बने हैं और तमाम देशों में मौसम विभाग सुनामी के पहुंचने के पहले चेतावनी दे सकते हैं। आधुनिक यंत्रों से यह बता पाना मुमकिन हो गया है कि अगर किसी भूकंप से सुनामी आई, तो वह किस वक्त किस तट पर पहुंचेगी। हालांकि यह भी सच है कि प्रकृति की ताकत इतनी होती है कि अक्सर तमाम उपाय धरे रह जाते हैं। सुनामी से बचने के सबसे ज्यादा इंतजाम जापान ने कर रखे हैं। वहां कई इलाकों में समुद्री तटों पर ऊंची-ऊंची दीवारें खड़ी कर दी गई हैं और कुछ इलाकों में समुद्र की लहरों की गति कम करने के लिए नहरों का इंतजाम किया गया है। लेकिन जापान में 1993 में जो सुनामी आई थी, उसकी लहरें 30 मीटर ऊंची थीं और वे सारे इंतजामों को ध्वस्त कर गईं। पिछले वर्ष आई सुनामी में भी सुरक्षा के इंतजाम एक-एक करके नष्ट होते गए। सुनामी से नुकसान कम करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि तटीय इलाके के लोगों को सुनामी के खतरों से आगाह किया जाए और उन्हें यह बताया जाए कि कौन सी जगहें सुरक्षित हैं। अनुभव यही बताता है कि आम लोगों को शिक्षित करना और सुनामी के दौरान तटीय इलाकों को खाली करके सुरक्षित जगहों तक पहुंचाने का इंतजाम ही सबसे अच्छा सुरक्षा तंत्र है। इस भूकंप ने तो कोई बड़ी तबाही नहीं की है, लेकिन इसने एक बार फिर चेतावनी तो दी ही है कि हमें लगातार सावधान रहना चाहिए। इसी के साथ कोडनकुलम में परमाणु बिजलीघर के निर्माण का विरोध करने वालों को भी नया तर्क मिल जाएगा। इस बिजलीघर के लिए और पुख्ता सुरक्षा इंतजाम करने की जरूरत तो है ही।

 

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