DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

न्याय की धीमी चाल

देश की व्यवस्था के तीनों प्रमुख अंगों, यानी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की छवि जनता में कतई अच्छी नहीं कही जा सकती, लेकिन ये तीनों एक-दूसरे पर सुस्त होने, भ्रष्ट होने और जनता से कटे होने के आरोप मढ़ते रहते हैं। उदाहरण के लिए, नया संविधान लिखे जाने की धीमी रफ्तार से न्यायपालिका आशंकित थी, इसीलिए इस काम के लिए विधायिका को एक समय-सीमा देने के उसके तर्क को उचित माना गया। लेकिन क्या न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारियां अच्छी तरह से निभा रही है? सुप्रीम कोर्ट व स्पेशल कोर्ट में भ्रष्टाचार के जो सुबूत मिले हैं, वे तो यही बताते हैं कि न्यायपालिका की हालत कोई बहुत बेहतर नहीं है। ‘सूडान घोटाला’ इसकी एक बानगी है। भ्रष्टाचार निरोधी शाखा ‘सीआईएए’ को त्वरित सुनवाई के लिए गठित स्पेशल कोर्ट में इस मामले को ले जाने और 34 पुलिस अधिकारियों तथा दो कॉन्ट्रैक्टरों के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले जांच करने में ही 19 महीने लग गए। फिर 10 महीने पहले स्पेशल कोर्ट ने मामले को खींचना शुरू किया। और सात महीने के बाद उसने तीन पूर्व पुलिस प्रमुखों को दोषी मानते हुए दंड का एलान किया। कोर्ट ने अपने फैसले में तीनों दोषियों को दो-दो साल की जेल और करोड़ों रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। लेकिन यह फैसला आए तीन माह बीत चुके हैं और सजायाफ्ता लोग न सिर्फ बेफिक्र घूम रहे हैं, बल्कि पूर्व पुलिस प्रमुख को मिलने वाली तमाम सरकारी सुविधाएं भी वे भोग रहे हैं। इससे जाहिर हो जाता है कि नेपाल की न्यायपालिका किस तरह से काम कर रही है। कायदे से तीनों पुलिस प्रमुखों को, यदि फैसला सुनाए जाने के वक्त वे अदालत में हाजिर थे, तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए था। यदि वे अदालत में मौजूद नहीं थे, तो कानून के मुताबिक उन्हें फैसले के अधिसूचित होने के बाद हिरासत में लिया जा सकता था। लेकिन सजा सुनाए जाने के तीन महीने बाद भी ये तीनों अभियुक्त खुलेआम घूम रहे हैं, यह सचमुच हैरानी में डालने वाली बात है। यह प्रकरण हमारी न्यायपालिका की सुस्ती को दुनिया भर में उजागर कर देता है।
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल     

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:न्याय की धीमी चाल