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हत्यारों से हमदर्दी

हमारे देश में आज एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई है। कुछ लोगों ने तो यह तय कर लिया है कि अपने धर्म से जुड़े आतंकवादियों, देशद्रोहियों और अतिविशिष्ट व्यक्तियों के हत्यारों को शहीद का दर्जा देकर रहेंगे। तभी तो फांसी की सजा पाने वाले अफजल गुरु, राजोआणा की सजा को माफ करने की मांग की जा रही है। यह आशंका जताकर डराया जा रहा है कि अगर इन्हें फांसी हुई, तो देश में दंगे-फसाद हो सकते हैं। धर्म का इस कदर दुरुपयोग चिंता की बात है। देश के कानून और प्रशासन का मजाक उड़ाने वालों को मनमानी करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। अगर सभी धर्मों के लोग अपने-अपने धर्म से जुड़े हत्यारों को शहीद का दर्जा देंगे, तो शहीदे आजम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बिस्मिल और खुदीराम बोस की आत्मा क्या नहीं तड़पेगी? इस खतरनाक प्रवृत्ति को रोकना होगा।
जसवंत सिंह, नई दिल्ली

चुनावों के बाद
पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणाम जो भी रहे हों, यह तय है कि चुनाव आयोग को उसकी सीमाओं के बावजूद क्रियान्वयन के लिए 10 में से 10 अंक मिलेंगे। परंतु इस बार भी नेता जीते और जनता हारी। उत्तर प्रदेश में ही कुछ जगह चुनावों के बाद विजय-पराजय की हिंसक प्रतिक्रिया देखने को मिली। जो चुने गए हैं, अब उन पर समूची जनता की जिम्मेदारी है। उन्हें इसका अहसास होना चाहिए कि अब वे किसी क्षेत्र विशेष या जाति मात्र के नेता नहीं हैं। वैसे, चुनाव आयोग ने यह उदाहरण तो रख ही दिया है कि प्रतिबद्धता से कैसे काम किया जाता है। उम्मीद है, अब अन्य सभी विभाग भी बेहतर समन्वयन के जरिये जमीनी स्तर पर परिणाम प्रदर्शित करते हुए राज्य और देश को विकास के पथ पर आगे ले जाएंगे।
दुर्गा नारायाण लाल दास, एडीए कॉलोनी, नैनी, इलाहाबाद

न्याय पर ग्रहण
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में शामिल रहे बलवंत सिंह राजोआणा की फांसी पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। इसी तरह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। ये हत्याएं तत्कालीन राजनीति के लिए तगड़ा झटका तो थीं ही, पर देश के लिए बड़ा नुकसान भी थीं। अगर न्याय व्यवस्था को एक विशेष नजरिये से देखें, तो हत्या के अपराधियों की फांसी पर राजनीति एक बहुत बड़ा सवाल है। बात सिर्फ राजीव गांधी या बेअंत सिंह के साथ न्याय की नहीं है। अजमल कसाब और अफजल गुरु जैसे तमाम देश के दुश्मनों की फांसी पर भी राजनीति का ग्रहण लग गया है। सवाल यह है कि जब देश को ही न्याय नहीं मिल पाता, तो भला आम जनता न्याय की क्या उम्मीद करेगी? आखिरकार इन तमाम मामलों में न्याय देश ही तो मांग रहा है?
वैभव शर्मा ‘वरिष्ठ’, ईस्ट ऑफ कैलाश, नई दिल्ली

गौरव और गुरबत
हाल ही में यह खबर पढ़ने को मिली कि झारखंड की निशा रानी ने अपने चार लाख रुपये के धनुष को मात्र 50 हजार में इसलिए बेच दिया, क्योंकि उनकी जिंदगी मुश्किल दौर में थी। उनकी आर्थिक हालत बेहद खराब थी और गरीबी के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। गौरतलब है कि निशा रानी ने साउथ एशियन चैंपियनशिप में तीरंदाजी में स्वर्ण पदक जीता था। यह बेहद मर्मातक खबर है। एक ओर तो हम क्रिकेट जैसे खेल में खिलाड़ियों पर अरबों रुपये लुटा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूर्व खिलाड़ियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। क्या झारखंड सरकार को यह खबर पढ़कर शर्म नहीं आई होगी? और सरकार ही क्यों, कोई भी सभ्य समाज इस बात पर निश्चिंत कैसे बैठ सकता है कि उसके लिए गर्व के क्षण अर्जित करने वाली उसकी ही एक बेटी भूखी और दुखी हो?
अवधेश कुमार, स्वाति अपार्टमेंट्स, पटपड़गंज, दिल्ली-92

 

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