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कांग्रेस जरूरत चुनौतियों पर चिंतन की

हालिया विधान सभा चुनावों में हार के बाद अब कांग्रेस को गहराई से इस पर विचार करने की जरूरत है कि वह लगातार क्यों कमजोर हो रही है। हार के कारणों की समीक्षा हो रही है, जबकि जरूरत है एक व्यापक विचार सत्र आयोजित करने की, जिसमें भावी रणनीति के साथ जमीनी कार्यकर्ता की जरूरतों और विकास प्रक्रिया तेज करने पर गहन विमर्श हो। केंद्र और राज्यों में जूझ रही कांग्रेस की मौजूदा दशा-दिशा पर निर्मल पाठक की रिपोर्ट

पांच में से चार राज्यों में हुई बुरी हार के बाद पहले राहुल गांधी की ओर से उत्तर प्रदेश के लिए हुई समीक्षा बैठक और फिर वरिष्ठ नेता ए. के. एंटनी के नेतृत्व में तीन सदस्यीय समीक्षा समिति के गठन के बाद अब कांग्रेस नेतृत्व की चुनौती। इस वर्ष के अंत तक पांच राज्यों में तथा 2014 के लोकसभा चुनावों से करीब 6-7 माह पहले चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए संगठन को मानसिक व भौतिक तौर पर चुस्त-दुरस्त करने की जरूरत है। पिछले कई वर्षों में पहली बार उत्तर प्रदेश में चुनाव के लिए अभूतपूर्व तैयारियों के बावजूद एकदम निराशाजनक परिणाम से नेता व कार्यकर्ता दोनों हतोत्साहित हुए हैं। यह धारणा बनती जा रही है कि देश के नक्शे पर पार्टी का वजूद धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। कार्यकर्ता के नेतृत्व पर से डगमगाते भरोसे को पिछले सप्ताह हुई दो दिन की बैठक ने कुछ थामा है। उत्तर प्रदेश के चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे लगभग दो सौ से अधिक लोगों से राहुल गांधी ने मुलाकात की और हार के कारणों के अलावा आगे के रोड मैप पर उनकी राय भी ली। संगठन के हालात पर पार्टी ने देश भर में जिला व ब्लॉक इकाइयों को 15 अप्रैल तक रिपोर्ट भेजने को कहा है। कुछ भड़ास निकली है, लेकिन नेतृत्व से अपेक्षाएं भी उतनी ही बढ़ गई हैं। उत्तर प्रदेश सहित पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में पार्टी के अपेक्षा से खराब प्रदर्शन के कारणों की समीक्षा कर रही एंटनी समिति संभवत: इस माह के अंत तक अपनी रिपोर्ट सौपेगी। और इस बार इस रिपोर्ट को कांग्रेस मुख्यालय में ही दफना देना नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा। उत्तर प्रदेश अकेला राज्य नहीं है, जहां संगठन और पदाधिकारी महज नाम के लिए हैं। ऐसे कई राज्य हैं। इसलिए कांग्रेस नेतृत्व पर इस बार यह दबाव ज्यादा है कि वह दिखावे के लिए नहीं, बल्कि संगठन को वास्तव में भावी चुनौतियों से लड़ने लायक बनाने की कोशिश करे।

क्या हैं चुनौतियां
इस साल के अंत तक गुजरात और हिमाचल प्रदेश सहित मेघालय, त्रिपुरा व नगालैंड में चुनाव होने हैं। यह कहा जा रहा था कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस यदि अच्छा प्रदर्शन करती यानी राज्य में बनने वाली किसी भी सरकार में वह महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में होती तो उसका असर गुजरात में शुरू होने वाले चुनाव अभियान पर पड़ता। कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल गांधी की अगुवाई में दोगुने-तीन गुने उत्साह से राज्य में भाजपा सरकार को हटाने में जुटते। वह स्थिति हाथ से निकल गई है। गुजरात दंगों में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को नकारने वाली एसआईटी की रिपोर्ट के बाद मोदी का प्रचार अभियान और आक्रामक होना तय है। कांग्रेस वहां उपलब्ध अपने बेहतर नेताओं को पहले ही आगे कर चुकी है। कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती कार्यकर्ताओं के मनोबल को न टूटने देने की है। त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में तो उसके सामने नेतृत्व संकट है ही, हिमाचल प्रदेश में भी ज्यादा विकल्प नहीं हैं। इन चुनावों के बाद अगले वर्ष आधा दर्जन राज्यों में फिर चुनाव होने हैं। कर्नाटक के अलावा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम, दिल्ली और राजस्थान में। पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़ दें तो शेष राज्यों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2013 में होने वाले विधानसभा चुनावों के 6 माह के भीतर लोकसभा के अगले चुनाव होंगे और इन राज्यों के परिणाम यह बताने वाले होंगे कि हवा का रुख किस ओर है। पिछली बार कांग्रेस को 33 सांसद देने वाले आंध्र प्रदेश में पार्टी पहले ही दो तरफा चुनौती से जूझ रही है। एक तरफ अलग तेलंगाना राज्य की मांग से वह परेशान है तो दूसरी तरफ जगनमोहन रेड्डी की बगावत के चलते सरकार पर हर समय खतरे की तलवार लटकी हुई है। उत्तरी राज्यों में कांग्रेस यदि अपनी स्थिति नहीं सुधारती तो उसके लिए लोकसभा चुनावों में पिछला प्रदर्शन दोहराना लगभग नामुमकिन है।

क्यों है मायूसी
यह पहली बार नहीं है, जब किसी चुनाव में हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एंटनी की अध्यक्षता में समिति का गठन किया है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में 2008 में चुनाव हारने के बाद कारण तलाश करने की जिम्मेदारी एंटनी को दी गई थी। इसके पहले 1999 में लोकसभा चुनावों में हार के बाद भी एंटनी को कहा गया था कि वह कारणों का पता लगायें।
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को इतनी कम सीट (केवल 111) पहले कभी नहीं मिली थीं। एंटनी समिति ने लंबी-चौड़ी रिपोर्ट दी थी और कुछ कम क्रांतिकारी सिफारिशों पर पार्टी ने अमल भी किया। लेकिन 2008 में चुनाव परिणामों की समीक्षा के बाद उन्होंने रिपोर्ट सौंपी या नहीं सौंपी या क्या सिफारिशें की, यह आज तक किसी को नहीं पता। पिछले सप्ताह दो दिन राहुल गांधी के साथ खुल कर दिल की बात करने वाले उत्तर प्रदेश के नेताओं के साथ ही देश के दूसरे राज्यों के कार्यकर्ता भी अब एंटनी समिति से उम्मीद लगाये हुए हैं कि वह रिपोर्ट सौंपे तो उसके बाद संगठन में आमूल बदलाव हो। उत्तर प्रदेश से एक केंद्रीय मंत्री का कहना था कि संगठन में राज्य और केंद्रीय स्तर पर पिछले 15-20 वर्षो से एक ही तरह के चेहरे देखते-देखते कार्यकर्ता ऊब चुके हैं। फास्ट फूड कल्चर वाले इस समय में लोग तेजी से बदलाव की अपेक्षा करते हैं और कांग्रेस कार्यकर्ता उनसे अलग नहीं हैं। इसलिए इस बार भी समीक्षा के नाम पर यदि खानापूर्ति हुई तो उसका खामियाजा कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में भुगतना पड़ेगा।

जरूरी कदम
संगठन में लगातार लग रहे जंग की जानकारी कांग्रेस नेतृत्व को है। एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार, ऐसा नहीं होता तो दिसंबर 2010 में बुराड़ी में महाधिवेशन के दौरान सोनिया गांधी जल्द चिंतन शिविर के आयोजन की घोषणा नहीं करतीं। वह चिंतन शिविर चाहती थीं। यह इस बात का प्रमाण है कि पार्टी में जो कुछ चल रहा है, उससे वह संतुष्ट नहीं थीं। लेकिन अन्ना का आंदोलन, संसद की व्यस्तता और फिर कांग्रेस अध्यक्ष के स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के चलते यह शिविर आज तक नहीं हो पाया है। शिविर तो दूर, प्रमुख मसलों पर कार्यसमिति की बैठक तक इस बीच नहीं हुई। विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद नेतृत्व पर फिर यह दबाव है कि वह जल्द  चिंतन शिविर आयोजित करे, जिसमें केंद्र सरकार के कामकाज की भी समीक्षा हो।
(लेखक हिन्दुस्तान के राजनीतिक संपादक हैं)

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