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व्यवसायिक लेकिन औपचारिक हुआ बॉलीवुड : अनुपम

व्यवसायिक लेकिन औपचारिक हुआ बॉलीवुड : अनुपम

अभिनेता अनुपम खेर बीते लगभग तीन दशक से फिल्मोद्योग का हिस्सा हैं। वह महसूस करते हैं कि पहले जहां बॉलीवुड में घनिष्ठता थी वहीं अब इसकी जगह व्यवसायिकता व औपचारिकता ने ले ली है।

अनुपम ने एक साक्षात्कार में कहा कि फिल्मोद्योग अब ज्यादा व्यवसायिक बन गया है, जो बहुत अच्छी बात है लेकिन इसके साथ ही यह बहुत औपचारिक भी हो गया है।

उन्होंने कहा कि जब यहां वैनिटी वैंस, मोबाइल्स नहीं थे तब यहां बहुत ज्यादा घनिष्ठता थी। लोग बैठते थे, एक-दूसरे से बातें करते थे और अपने विचारों का आदान-प्रदान करते थे। लेकिन अब यहां अलगाव या अलग-थलग रहने की स्थिति है। यह बढ़िया है लेकिन मैं लोगों से मिलने-जुलने वाला व्यक्ति हूं इसलिए मैं अपने सह-कलाकारों की वैन में चला जाता हूं और उनसे बातें करता हूं।

पद्मश्री से सम्मानित अनुपम ने 'सारांश' में सशक्त अभिनय कर बॉलीवुड में अपनी खास जगह बनाई थी। उन्होंने 'कर्मा' में एक खलनायक की तो 'लम्हे' में हास्य भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा का भविष्य बहुत उम्दा है। अब आप अपने विचारों व विश्वासों के अनुरूप फिल्में बना सकते हैं आपको एक तय फॉर्मूले पर फिल्म बनाने की आवश्यकता नहीं है, जो बहुत अच्छी बात है।

अनुपम ने कहा कि एक समय था जब छोटी फिल्मों के अच्छा व्यवसाय करने के विषय में सोचना बहुत मुश्किल था लेकिन अब ऐसी फिल्में सफल होती हैं। 'खोसला का घोसला', 'ए वेडनेस्डे' और 'कहानी' ऐसी ही कुछ फिल्में हैं। यदि कम बजट की फिल्मों को अच्छी तरह बनाया जाए तो वे अच्छा व्यवसाय करती हैं।

वह कलाकारों को अभिनेताओं व चरित्र अभिनेताओं में बांटने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह का विभाजन केवल बॉलीवुड में ही होता है जबकि अन्य जगहों पर ऐसा नहीं है।

उन्होंने कहा कि आप रॉबर्ट डीनीरो, अल पचिनो को चरित्र अभिनेताओं के रूप में नहीं देख सकते। बलराज साहनी, ओम प्रकाश, कन्हैयालाल और मेहबूब ने सिनेमा जगत में जो योगदान दिया है वह अविश्वसनीय है। ये लोग अभिनय के प्रणेता थे और उन्हें वर्गो में बांटना गलत है।

अनुपम की फिल्म 'छोड़ो कल की बातें' शुक्रवार को प्रदर्शित होने जा रही है।

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