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भारत में सरकारी नौकरी करना हुआ मुश्किल

देश में सार्वजनिक क्षेत्र के 70 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी महसूस करते हैं कि उनका नियोक्ता उनसे उम्मीद करता है कि वे हमेशा उपलब्ध रहें, जबकि निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों का अनुभव ऐसा नहीं है। यह बात रैंडस्टैड वर्कमॉनिटर सर्वे 2012-वेव 1 से सामने आई है।

ताजा निष्कर्षों के अनुसार, सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले 72 प्रतिशत कर्मचारी महसूस करते हैं कि उनका नियोक्ता चाहता है कि कर्मचारी पूरे समय उपलब्ध रहें।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि इस तरह का अनुभव करने वाले सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों की संख्या निजी संगठनों में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या (59 प्रतिशत) से बहुत अधिक है।

सर्वेक्षण से यह बात भी सामने आई है कि भारतीय श्रमशक्ति की एक बड़ी आबादी का कामकाजी जीवन और निजी जीवन आपस में मिला-जुला हुआ है। सर्वेक्षण में शामिल किए गए लगभग 80 प्रतिशत कर्मचारियों ने कहा है कि उन्हें कार्यालय अवधि के बाद भी काम से सम्बंधित फोन काल्स और ई-मेल्स प्राप्त होते रहते हैं।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि सर्वेक्षण में शामिल की गई कुल श्रमशक्ति में से 69 प्रतिशत ने कहा कि वे कार्यालय से सम्बंधित मामलों को स्वेच्छया अपने निजी समय के दौरान निपटाते हैं, और 79 प्रतिशत कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें छुट्टी के दिन भी काम से सम्बंधित फोन काल्स और ई-मेल्स प्राप्त होते रहते हैं।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि इससे यह स्पष्ट होता है कि कर्मचारियों को कामकाजी जीवन के संतुलन से निपटना वाकई में एक चुनौती है।

इन निष्कर्षो पर टिप्पणी करते हुए मा फोई रैंडस्टैड के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, ई. बालाजी ने कहा कि प्रौद्योगिकी से कार्य क्षमता में तो पर्याप्त मात्रा में वृद्धि हुई है, लेकिन इसका बुरा पक्ष यह है कि इससे कर्मचारियों के निजी जीवन में पूरे सप्ताह 24 घंटे की दखलंदाजी पैदा हो गई है।

बालाजी ने कहा कि पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं ने कामकाजी जीवन के संतुलन के महत्व को समझा है और नियोक्ताओं ने इस चुनौती से निपटने के लिए सावधानीपूर्वक प्रक्रियाएं विकसित की है।

 

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