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दांत भी हैं सेहत का आईना

साठ प्रतिशत से अधिक लोग किसी न किसी तरह की दांतों से जुड़ी समस्या से पीड़ित मिलते हैं। वहीं यह भी सच है कि दांतों की सामान्य और नियमित सफाई से 50 प्रतिशत बीमारियों को दूर रखा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार दांतों का सीधा संबंध हमारे दिलो-दिमाग से होता है। ऐसे में दांतों की सेहत का सही ध्यान रखना कई अन्य बीमारियों को रोक सकता है। कैसे? बता रहे हैं शैलेंद्र सिंह नेगी

दांत के हल्के से दर्द को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये हल्का दर्द किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है, यह कहना है इंडियन सोसाइटी ऑफ न्यूरो मस्क्युलर डेंटिस्ट्री के चेयरमैन व डेंटिस्ट डॉ. संजय अरोड़ा का। दांतों में ठंडा-गरम लगना, पायरिया, कैविटी, सांस में बदबू और दांतों का बदरंग होना मात्र ही दांतों की बीमारियां नहीं हैं, लंबे समय तक इनकी लापरवाही से गर्दन और रीढ़ की हड्डी में दर्द, सिर दर्द, दिमागी तनाव और मुख के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।

दांतों पर पड़ता है जीवनशैली का असर
मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज के डायरेक्टर डॉ. महेश वर्मा के अनुसार, गलत जीवनशैली का कुप्रभाव दांतों पर भी पड़ रहा है। खान-पान का ध्यान न रखना, देर रात तक खाना और खाने के बाद दांतों की सफाई न करना कई तरह की बीमारियों को बुलावा दे रहा है। दांतों की सही सफाई न होने पर दांतों पर परत जम जाती है, जिसमें बनने वाला बैक्टीरिया टॉक्सिन दांतों को नुकसान पहुंचाता है। दांतों में फंसा हुआ खाना बैक्टीरिया सल्फर कंपाउंड बनाता है, जिससे सांस में बदबू हो जाती है। यह बदबू मुंह के अंदर, जीभ के पीछे वाले हिस्से और मसूड़ों के निचले हिस्से में बनती है।

सीनियर डेंटल सर्जन डॉ. शारदा अरोड़ा कहती हैं, ‘बच्चों को पिज्जा, चॉकलेट, आइसक्रीम और चाउमीन जैसे फास्ट फूड खिलाना भी कई तरह की बीमारियों को बुलावा देता है। मधुमेह के रोगियों को खास दांतों का ध्यान रखना चाहिए। अगर शुगर नियंत्रित नहीं है तो दांतों के साथ मसूड़ों पर भी बुरा असर पड़ता है, जिससे मसूड़ों के खिसकने, संक्रमण और जीभ में जलन होने जैसी दिक्कतें होती हैं।

दांतों का दर्द 
दांत दर्द अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, बल्कि आने वाले खतरे का संकेत है। दांतों के दर्द की शुरुआत आमतौर पर मसूड़ों में सूजन, ठंडा-गरम और कैविटी बनने से होती है। ज्यादातर मामलों में दर्द की वजह कैविटी होती है। दांतों के सड़ने पर उसकी सतह पर होने वाले छिद्र को कैविटी कहते हैं। अगर आपके दांतों में काले या भूरे धब्बे दिखाई दें और दांतों में दर्द हो तो यह कैविटी के लक्षण हैं। लंबे समय तक इसका उपचार न कराने से दांतों में सड़न के साथ ही, मसूड़ों में सूजन, जबड़ों में और सिर में दर्द की शिकायत हो सकती है। मीठी चीज खाने से बैक्टीरिया पैदा होता है और सफाई न करने पर दांतों में ब्लैक स्पॉट बन जाते हैं। इसे आमतौर पर हम कीड़ा लगना कहते हैं।

आमतौर पर कुछ खाते समय दांतों में कुछ फंस जाना, कैविटी बनना, नया दांत निकलना या कोई सख्त चीज काटने के कारण दांतों में क्रैक की वजह से भी दांत में दर्द होने लगता है। ऐसी स्थिति में गर्म पानी से कुल्ला करें या फिर दांतों के बीच फ्लॉस करें (धागे की मदद से दांतों में से फंसा हुआ अंश निकालना फ्लॉसिंग कहलाता है)। अगर दर्द ज्यादा हो तो आइस पैक या तौलिए में बर्फ रख कर उसे गालों पर कुछ देर के लिए रखें। गालों में सूजन आ जाए और दर्द हो तो फ्रोजेन पीज़ को आइसपैक की जगह लगाएं। ये कैमिस्ट की दुकान पर मिल जाते हैं। 

दांतों में धब्बे
तंबाकू और अन्य कई नशीली चीजों के सेवन या फिर उम्र बढ़ने के साथ भी दांतों में काले धब्बे बन जाते हैं। हालांकि इन धब्बों से कोई नुकसान नहीं होता,  पर यदि चाहते हैं कि आपके दांत सफेद व चमकदार लगें तो आप व्हाइट टूथपेस्ट का इस्तेमाल करें। डेंटिस्ट से ब्लीच भी करवा सकते हैं, लेकिन ये उपचार महंगा होता है।

दांतों से दिल को खतरा
ओरल इन्फेक्शन में जो बैक्टीरिया होते हैं, वही बैक्टीरिया हृदय रोगों का कारण भी होते हैं। एक शोध के मुताबिक हार्ट अटैक के 40 फीसदी मरीजों में मसूड़ों की दिक्कत देखने को मिली है। हृदय के साथ फेफड़ों का संक्रमण भी मुख में उत्पन्न बैक्टीरिया से बढ़ता है। जब दांत खराब होते हैं या मसूड़ों में सूजन होती है तो धमनियां सुकड़ जाती हैं। इसकी वजह से दांतों में मौजूद बैक्टीरिया धमनियों में जाकर उनमें भी प्लाक बना देते हैं और वे संकरी हो जाती हैं। शोध कहते हैं कि जिन महिलाओं को मसूड़ों की दिक्कत होती है, उनमें मिस कैरिज या प्री-मैच्योर बच्चा होने की आशंका बढ़ जाती है।

सर्वाइकल पेन का कारण दांत तो नहीं!
सर्वाइकल पेन और माइग्रेन की वजह आपके खराब दांत भी हो सकते हैं। लंबे समय तक यह संक्रमण जॉइंट में दर्द का कारण बनता है। डॉक्टर संजय अरोड़ा  कहते हैं, ‘जब हमारे ऊपर और नीचे के दांत टकराते हैं तो पूरा दबाव हमारे जबड़ों पर पड़ता है। दांतों तक खून पहुचाने वाली मुलायम नसें प्रभावित होती हैं। चूंकि जबड़े का संबंध हमारे गले और कंधे से है, इसलिए जबड़ों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव का असर भी इन पर पड़ता है, जिससे कंधे और पीठ दर्द की शिकायत होती है। इसके लिए दांतों में फिलिंग की जाती है, ताकि दांत टकराएं नहीं और आपके जबड़े को मूवमेंट की पूरी जगह मिल जाए। कई बार हम दिखावे के चक्कर में अखरोट या अन्य कठोर चीजों को दांतों से तोड़ने का प्रयास करते हैं, पर ऐसा करना अपने लिए सर्वाइकल की समस्या को बुलावा देना हो सकता है।

स्टेमसेल से चमकते रहेंगे आपके दांत
कई बार खेलते-खेलते बच्चों के दांतों में चोट लग जाती है, जिससे दांतों की जड़ें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और लिगामेंट बोन बननी बंद हो जाती है या ब्लड वेसल्स नष्ट हो जाते हैं और जड़ें कमजोर हो जाती हैं। इन सबके कारण दांत दोबारा नहीं उग पाते। दांत जल्दी टूटने और नहीं आने से परेशान लोगों के लिए स्टेम सेल तकनीक वरदान बन कर सामने आई है। विकसित देशों में यह तकनीक काफी इस्तेमाल हो रही है, पर भारत में अभी इसका चलन नहीं बढ़ा है। भारत में स्टेमसेल को प्रिजर्व करने के काम में लगी कंपनी स्टेमेड बायोटेक के शैलेश गादरे का दावा है कि अब नकली दांत या बत्तीसी लगवाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दूध के दांत में मौजूद स्टेम सेल से पूरे के पूरे नये दांत विकसित किए जा सकते हैं। इस संबंध में बच्चों के दूध के दांतों से स्टेम सेल निकाल कर संरक्षित करने का काम भी शुरू किया जा चुका है। हालांकि यह उपचार महंगा है, जिसमें 1 से 5 लाख रुपये तक खर्च होता है।

एम्स में सेंटर फॉर डेंटल एजुकेशन एंड रिसर्च की निदेशक डॉ. नसीम शाह ने कहा कि यहां वर्ष 2006 में पहले चरण में चार बच्चों में सफलता हासिल की गई है। अब तक यह संख्या 13 तक पहुंच चुकी है। इसमें दूध के दांत में मौजूद स्टेम सेल को सुरक्षित करने के लिए बच्चों का दूध का दांत टूटने के 24 घंटे के भीतर उसे संरक्षित कराना होता है। मार्केट सर्वे कंपनी मार्केट वायर का दावा है कि 2015 तक स्टेम सेल तकनीक का बाजार 64 बिलियन डॉलर होगा, जिसमें भारत का हिस्सा 28 फीसदी होगा। 

दांतों के रूट की हड्डी में मेम्ब्रेन, प्री डेंटल लिगामेंट और स्टेम सेल्स होते हैं।  इन्हें दोबारा एक्टिव बनाने के लिए बच्चों की आरसीटी कर सबसे पहले संक्रमण हटाया जाता है और फिर जड़ खोद कर रक्त निकाला जाता है और उसे जड़ में ही रोक कर थक्का जमा लिया जाता है। इसके साथ निकले स्टेम सेल ब्लड के थक्के के साथ मिल कर वहीं ठहर जाएंगे और धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त टिश्यू फिर से बनने लगेंगे।

गम डिजीज
गम डिजीज एक तरह का संक्रमण है, जो दांतों के नीचे हड्डियों तक फैल जाता है। यह एक आम समस्या है, जिसके कारण दांत टूट जाते हैं। शुरुआती स्तर पर पता लगने पर इसका उपचार आसानी से हो जाता है। इस दौरान ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आना, मसूड़ों का लाल होना, सूजन और दर्द, मुंह से दुर्गंध आदि लक्षण देखने को मिलते हैं। सामान्य स्थिति में दांतों को ठीक से व्रश करने और फ्लॉस करने से समाधान पाया जा सकता है।

कुछ सवाल
- टूथपेस्ट क्यों इस्तेमाल करें?
टूथपेस्ट में फ्लोराइड हो तो वह दांतों को कीड़ा लगने से बचाता है। छोटे बच्चों के लिए फ्लोराइड वाला पेस्ट उपयोग नहीं करना चाहिए। दांतों की सफाई में टूथपेस्ट लुब्रिकेशन और ताजगी का काम करता है।

- फ्लॉसिंग कब करें?
फ्लॉसिंग यानी दांतों के बीच में फंसे खाने को धागे से निकालना या साफ पानी से कुल्ला करना। फ्लॉसिंग रोजाना करें।
- ब्रश कैसे करें?
दिन में कम-से-कम दो बार ब्रश जरूर करें। ब्रश करने में तीन से चार मिनट का समय अवश्य दें। कई लोग दांतों को बर्तन की तरह मांजते हैं। इससे दांत घिस जाते हैं। दांतों को हमेशा मुलायम ब्रिसेल्स से हल्के दबाव से धीरे-धीरे साफ करें। ऊपर के दांतों को नीचे की ओर और नीचे के दांतों को ऊपर की ओर ले जाते हुए ब्रश करें। जीभ को ब्रश से साफ करें। उंगली या ब्रश से धीरे-धीरे मसूड़ों की मालिश करें। इससे मसूड़े मजबूत होते हैं।
- कैसा ब्रश इस्तेमाल करें?
ब्रश सॉफ्ट होना चाहिए। ब्रिसेल्स खराब होने या फैलने से पहले ही उसे बदल दें। 

घरेलू उपाय
- पानी में आधा चम्मच सेंधा नमक मिला लें। रात में सोने से पहले इससे कुल्ला करें।
- बेकिंग सोडा और हाइड्रोजन पैराऑक्साइड को मिला कर पेस्ट बना लें। हफ्ते में एक बार इससे दांत साफ करें।
- संतरे के छिलके को अंदर की तरफ से हल्के हाथ से दांतों पर रगड़ने से दांत साफ हो जाते हैं।
- नींबू का रस और सेंधा नमक बराबर मात्रा में मिला लें। दांतों के पीले हिस्से पर धीरे-धीरे रगड़ें।
- तुलसी का पेस्ट बनाएं, उसमें थोड़ी चीनी मिला लें। अगर मधुमेह है तो चीनी की बजाय शहद मिला कर मसूड़ों पर मसाज करें। पानी में शहद मिला कर गरारे करना भी लाभ देता है। 

गर्भवती महिलाएं रखें खास ख्याल
गर्भवती महिलाओं को अक्सर परिवार की बुजुर्ग महिलाएं ब्रश न करने की सलाह देती हैं। उनके अनुसार गर्भावस्था के दौरान दांतों पर ब्रश करने से दांत कमजोर हो जाते हैं और उनका जल्द टूट कर गिरने का खतरा बन जाता है। डॉ. शारदा अरोड़ा के अनुसार अगर गर्भवती महिलाएं गर्भ के दौरान ब्रश करना छोड़ती हैं तो उन्हें दांतों की बीमारी हो सकती है। इसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ सकता है। महिलाओं को गर्भावस्था में दांतों व मसूड़ों की समस्या होती है। हार्मोनल बदलाव के कारण ऐसा होता है। ऐसे में मसूड़ों में सूजन, उनसे खून निकलना, मसूड़ों के लाल होने जैसे लक्षण आ सकते हैं। इससे जोड़ों को पकड़ कर रखने वाले फाइबर को नुकसान होता है। इसका असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है। बच्चों के दांत और मसूड़ों के साथ-साथ उसका वजन आदि भी प्रभावित होता है। बेहतर होगा कि महिलाएं प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले दांतों की जांच करा लें, ताकि दांत संबंधी किसी समस्या से पहले ही निजात मिल जाए। गर्भावस्था के पहले कुछ हफ्तों में दांतों से संबंधित इलाज से बचने की सलाह दी जाती है।

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