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जहां संपन्नता में पल रहा है रूढ़िवाद

पाकिस्तान के आधुनिक शहर लाहौर में बैंक ऑफ पंजाब के मुख्यालय में जितनी महिलाएं काम करती हैं, सबके सिर पर स्कॉर्फ होता है, जो मजबूती से बंधा होता है और जिससे ठुड्ढी तक पूरी तरह से ढक जाती है। एक साल पहले तक यहां सिर ढकने और हिजाब पहनने वाली महिलाएं नहीं दिखती थीं। शहर के एप्पल आई स्टोर में 28 साल की शुमालिया अपने मैक बुक में सॉफ्टवेयर डलवाने आई हैं। वह बताती हैं, ‘मैंने सबसे पहले कुरान पढ़ना और पांचों वक्त की नमाज अता करना शुरू किया। किसी ने मुझ पर हिजाब पहनने के लिए दबाव नहीं डाला। फिर तो दफ्तर की सभी लड़कियों ने ऐसा करना शुरू कर दिया।’

इस बात के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह साफ-साफ दिखता है कि पाकिस्तान में संपन्न तबके की और अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी महिलाएं भी तेजी से रूढ़िवादी तौर-तरीकों को अपनाने लगी हैं। पिछले कुछ दशकों में यहां जिस तरह का सांस्कृतिक और मजहबी बदलाव आया है, यह उसी का एक हिस्सा है। इसका एक उदाहरण कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी में मिलता है। पिछले कुछ समय में इस संगठन में महिला सदस्यों और कार्यकर्ताओं का अनुपात बढ़ा है। इस संगठन का मुख्य आधार निम्न मध्य वर्ग में है, जिसकी संख्या पिछले कुछ समय में तेजी से हुए शहरीकरण और आर्थिक विकास के कारण बढ़ी है। इसी तरह साल 1994 में शुरू हुए संगठन अल हुदा ने भी महिलाओं में अपना आधार तेजी से फैलाया है। इसकी जड़ें पाकिस्तान के संपन्न तबकों में हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे संगठन इस्लाम के उस असहिष्णु रूप को प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों में प्रचलित है। इस्लामाबाद में शुरू हुआ यह संगठन अब पूरे पाकिस्तान में फैल गया है, और इसका आधार अब उन पाकिस्तानियों में भी है, जो मुल्क से बाहर रह रहे हैं। इसके सदस्यों को कुरान का अध्ययन कराया जाता है।

कभी अल हुदा की सदस्या रही माहा जहांगीर बताती हैं, ‘जो लोग आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई के दौरान बड़े हुए हैं, उनके मन में तरह-तरह के सवाल हैं। ये सवाल उन्हें मजहब की ओर ले जाते हैं। कुछ लोग रूढ़िवादी तौर-तरीकों में इसका जवाब पा लेते हैं।’

ऐसा नहीं है कि ये महिलाएं जिन संगठनों से जुड़ी हैं, उनकी राजनीति का भी इन पर कोई असर है। मसलन माहा को ही लें। उन्होंने मैसाच्युसेट्स और लंदन यूनिवर्सिटी, दोनों ही जगहों से डिग्री हासिल की है। उसके बाद उन्होंने इस्लाम की देवबंदी धारा से मजहब की शिक्षा भी ली है। तालिबान इसी धारा के माने जाते हैं। लेकिन माहा का कहना है, ‘मुझे तालिबान का कोई अर्थ समझ में नहीं आता। मुझे तो वे दकियानूस और बेमतलब लगते हैं। मेरे लिए तो यह बस रूहानियत का रास्ता है।’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
द गाजिर्यन से साभार

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