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अथश्री मच्छर भन्न महाराज

बढ़ती हुई तपिश से जूझने के तईं मौलाना बनियान-घुटन्ना पहने अपने बरामदे में ठंडा नींबू-पानी खींच रहे थे। मेरे लिए भी मंगवाया। बोले, ‘भाई मियां, नई प्रदेश सरकार की तरह गरमी भी स्पीड पकड़ रही है। बदन से पसीने का डीजल जारी है। आपके कने एसी है, सो तरावट में हो। मगर बिजली की आवाजाही से एसी के जलवे भी ठुस्स हो रहे हैं। बिजली का हाल भी सरकारी वायदों जैसा है। फेंके थे पांच किलो भर.., पांच ग्राम भी हासिल हो जाएं तो गनीमत है। बहरहाल, अभी से छेड़छाड़ ठीक नहीं। नौजवान मुख्यमंत्री का हौसला पस्त नहीं करना है। कैरी ऑन, यंग मैन।’

नींबू-पानी का खाली गिलास अंगुली से बजाकर बोले, ‘न्यूजें पढ़ीं? अमां छपा हैगा कि शहर में मच्छरों का प्रकोप अचानक बढ़ गया है। इसमें नया क्या है भाई मियां? सीजन बदले या सत्ता बदले, भनभनाहट बढ़ ही जाती है। अब भला मच्छरों को खुराक अनाज गोदामों से तो मिलेगी नहीं। आदमी की खाल पर ही सुई मारेंगे और खून की बूंदों का ही डिनर करेंगे। सत्ता में भनभनाहट असंतोष की होती है कि किस विभाग की उम्मीद थी, कौन-सा मिला। जिन्हें कोई विभाग नहीं मिला, उनकी भन्नाहट और तेज होती है। पार्टी बदलकर आए, फिर भी हाशिये पर डाल दिए गए। भन्न.., अब किसके बाप को बाप कहें। मच्छरदानी के बराबर बाहर भिन्ना रहे हैं कि कोई छोटी-मोटी चेयरमैनी ही मिल जाए। जीतने के बाद भी फुर्र-फुर्र। सारे अरमानों पर बेगान स्प्रे मार दिया हाई कमान ने। अब मैं का करूं, कित जाऊं? ..भन्न।’

दाढ़ी खुजलाकर फिर मौलाना बोले, ‘रातों की नींद हराम है। गुड नाइट की टिकिया जल रही है, फिर भी दाढ़ी में घुसकर जश्न मना रहे हैं। पुराने वक्तों में उपले का धुआं देने से भाग जाते थे। रात चैन से गुजरती थी। अब तो निगोड़े इतने हाईटेक हो गए हैं कि स्प्रे भी उनके ठेंगे पर है। अपने हिस्से का माल चूसने को न मिला, तो मच्छरगिरी पर लानत। यह भी कोई इंसाफ है कि कुछ मच्छर तो मजे में अपनी सिरिंजें भर रहे हैं, कुछ मच्छरदानी के बाहर सिर पटक रहे हैं। चलूं मियां, नहाकर रात की नींद पूरी करूंगा। जय हिंद। ..’

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