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धर्म का अर्थ है विस्तार

मनुष्य अपना मानसिक विकास चाहता है। वह एक ही जगह पर टिके नहीं रहना चाहता। यह जो उसमें विस्तार की इच्छा है, यही मनुष्य का साधारण गुण है, स्वाभाविक चीज है, शरीर के नष्ट न होने तक यह मनुष्य में रहेगी। हम दूसरे को दबाकर नहीं रखेंगे, दूसरे के विकास के रास्ते को अवरुद्ध करके नहीं रखेंगे और जो आदमी अपने विकास के लिए उपयुक्त प्रयास नहीं कर रहा है, उसे आगे बढ़ने के लिए हम उपयुक्त मौका भी प्रदान करेंगे और प्रेरणा देंगे, यही ‘विस्तार’ का सही अर्थ होगा। रस का अर्थ है प्रवाह। इस विश्व में एक अखंड ईश्वरीय रस बहता रहता है। उसके प्रवाह के कारण ही यह जगत बना हुआ है, और जगत की स्थिति भी उसी के कारण होती है। सबमें गति है, कोई भी बैठा नहीं रह सकता, क्योंकि ईश्वर के संबंध में कहा जाता है- ‘रसो वै स:’- वह रसस्वरूप हैं। वह हैं विराट प्रवाह। उनकी ही एक संतान मनुष्य है, जो सबसे उन्नत संतान है। उसमें भी तो रस-प्रवाह का रहना जरूरी है। इसी के कारण कहा गया है- मनुष्य का अस्तित्व एक आदर्शमुखी प्रवाह है। मनुष्य में सेवा की भावना है।

किसी भी व्यवसाय का मूल विषय होता है- कुछ दो और कुछ लो। ‘एक रुपया दो और उसके बराबर मूल्य की वस्तु लो।’ देन-लेने का प्रश्न है अर्थात व्यापार द्विमुखी होता है, एकतरफा नहीं। परंतु सेवा एकतरफा होती है। मैंने ईश्वर को सब कुछ दे दिया, लेकिन उसके बदले में उनसे कुछ भी नहीं मांगा, केवल ईश्वर को ही मांगा और चूंकि मैं सबसे मूल्यवान वस्तु को चाहता हूं, इसलिए मैं अपनी सबसे मूल्यवान वस्तु अपने अस्तित्व को ही सौंप देता हूं। मूल्यवान वस्तु पाने के लिए मूल्यवान वस्तु तो देनी ही होगी। यही तीन स्तर है- मनुष्य का मानव धर्म अर्थात भागवत धर्म। जो मनुष्य इन तीनों स्तरों में प्रतिष्ठित होगा, वही मानव समाज को सतपथ पर चलने के लिए राह दिखा सकता है।

 

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