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नकल रोकने की कीमत

हरियाणा के सोनीपत में एक शिक्षक की छात्र ने इसलिए हत्या कर दी कि शिक्षक ने उसे नकल करने से रोका था। यह अपने किस्म की कोई अकेली घटना नहीं है, ऐसी घटनाएं पहले हो चुकी हैं। नकल करने से रोकने पर शिक्षकों को धमकाने या हिंसा की घटनाएं अक्सर घटती रहती हैं। कुछ प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और स्कूल छोड़ दिए जाएं, तो भारत में शिक्षा क्षेत्र इसी किस्म की अराजकता और गुंडागर्दी का शिकार है। सबसे बुरी गत उन शिक्षकों की है, जो अपना काम ईमानदारी से करना चाहते हैं या उन छात्रों की है, जो पढ़-लिखकर अपना भविष्य बनाना चाहते हैं। जाहिर है, बहुसंख्य शिक्षक और छात्र इन्हीं श्रेणियों में आते हैं, लेकिन कुछ दबंग छात्रों या भ्रष्ट शिक्षकों के आचरण का वे शिकार हो जाते हैं। परीक्षा में नकल या नाजायज तरीकों का इस्तेमाल रोकना कितना खतरनाक हो सकता है, यह सोनीपत की घटना से स्पष्ट है, जहां छात्र ने शिक्षक को कार से कुचलकर मार डाला। कुछ वर्षो पहले हिंदी कवि मानबहादुर सिंह की भी हत्या कर दी गई थी, वह उत्तर प्रदेश में एक कॉलेज के प्राचार्य थे। उज्जैन में प्रोफेसर सभरवाल की हत्या को भी बहुत वक्त नहीं हुआ है। छोटे कस्बों और गांवों में तो शिक्षक और भी ज्यादा असुरक्षित होते हैं, जहां वे स्थानीय दबंगों के रहमोकरम पर होते हैं, जिनमें से कुछ तथाकथित छात्र भी होते हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि हमारी शिक्षा प्रणाली का आधार ही परीक्षा पास कर लेना है। चाहे इसे किसी भी तरीके से क्यों न किया गया हो। इस तरीके की सफलता को हमारा तंत्र भी जानता है, इसलिए अक्सर किसी प्रतिष्ठित संस्थान में या पाठ्यक्रम में भर्ती के लिए पिछली परीक्षा के नतीजों को कोई तवज्जो नहीं दी जाती। चाहे आईआईटी या इंजीनियरी के पाठ्यक्रम हों या मेडिकल में भर्ती या फिर आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों में दाखिले का सवाल हो, हर संस्थान अपनी प्रवेश परीक्षा लेता है और उसके नतीजों के आधार पर ही दाखिला देता है। जो देश एक ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण का दावा कर रहा हो, उसमें अपनी ही शिक्षा व्यवस्था पर इतना अविश्वास सोचने का विषय है।

श्रीलाल शुक्ल ने लगभग 45 वर्ष पहले राग दरबारी  लिखा था, लेकिन आज भी भारत की शिक्षा प्रणाली राग दरबारी युग से बाहर आने में कामयाब नहीं हुई है। शिक्षा का सामान्य स्तर ऊपर उठाने की बजाय कुछ विशिष्ट संस्थान बनाना एक शॉर्ट कट से ज्यादा कुछ नहीं है। व्यापक निजीकरण ने शिक्षा के पतन को व्यावसायिक और सांस्थानिक स्वरूप दे दिया है। भारत के अधिकांश साधनविहीन नागरिक यह जानते हैं कि उनकी संतानों के लिए बेहतर भविष्य का पासपोर्ट सिर्फ शिक्षा है और इसलिए वे अपना पेट काटकर बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था न उन नागरिकों के त्याग का मोल समझती है, न ज्ञान देने वाले गुरु की गरिमा और सुरक्षा का इंतजाम करती है। यह माना जा रहा है कि भारत की अब तक की तरक्की सेवा क्षेत्र के विस्तार पर आधारित है, लेकिन भविष्य में तरक्की का आधार विनिर्माण क्षेत्र होगा। इसके लिए भारत को शोध और विकास के केंद्र विकसित करने होंगे। जैव प्रौद्योगिकी, दवा और रसायन, वाहन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में यह माना जा रहा है कि इनके शोध के लिए सबसे ज्यादा संभावनाएं भारत में हैं, लेकिन यह तब संभव होगा, जब हमारे पास शिक्षित और प्रशिक्षित नौजवानों की बड़ी तादाद होगी। इसमें जैसे-तैसे डिग्री हासिल कर लेने वालों से काम नहीं चलेगा। हमारी परंपरा में गुरु-शिष्य का संबंध बहुत पवित्र है, क्या नए जमाने में हम इस परंपरा की नींव पर बेहतर आधुनिक शिक्षा प्रणाली बनाने की चुनौती स्वीकार करेंगे?

 

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