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कैसी बुद्धिमानी

हाल ही में भारत आए आसिफ अली जरदारी से भारत सरकार ने कहा कि हाफिज सईद के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि वह 26/11 का गुनहगार है। सरकार ने उसे भारत को सौंपने की भी मांग की। लेकिन मैं अपनी सरकार से यह पूछना चाहती हूं कि आतंकवादी कसाब और अफजल गुरु पहले से भारत में हैं। देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि ये दोषी हैं, फिर सरकार उनको फांसी क्यों नहीं देती? क्यों इनको वीआईपी की तरह जेल में रखकर इन पर करोड़ों रुपये फूंक रही है? जब सजायाफ्ता आतंकवादियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही, तो फिर हाफिज सईद और दाऊद को लेकर हम क्या करेंगे? क्या उन्हें भी यहां लाकर खिलाएंगे-पिलाएंगे? इससे तो अच्छा है कि उन्हें पाकिस्तान में ही रहने दें। कम से कम हमारा जी तो नहीं जलेगा।
अर्चना गुप्ता, मिलेनियम अपार्टमेंट्स, सेक्टर- 61, नोएडा

मार्क्स पर तकरार
ममता बनर्जी सरकार पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रमों से साम्यवादी विचारधारा व इसके प्रवर्तकों से संबंधित पाठ हटाने जा रही है। यह एक गलत फैसला है। इसके बुरे नतीजे हो सकते हैं। वैसे भी इतिहास और राजनीतिशास्त्र में जब विभिन्न प्रकार की विचारधाराएं विद्यार्थियों को समझाई नहीं जाएंगी, तो वे इनकी समालोचना क्या कर पाएंगे और बाद में अपनी राय क्या बना सकेंगे? विश्व के सभी लोकतांत्रिक देशों में समाजवाद, पूंजीवाद और अन्य विचारधाराओं को पाठय़क्रमों में स्थान दिया जाता है। ममता बनर्जी को नहीं भूलना चाहिए कि ऐतिहासिक और राजनीतिक विचारधाराएं मानव इतिहास की धरोहर हैं। विद्यार्थियों का यह मौलिक अधिकार है कि वे इनके बारे में जान सकें।
नवीनचंद्र तिवारी, सी-22, तुलसी अपार्टमेंट, सेक्टर-14, रोहिणी, दिल्ली-85

फांसी क्यों नहीं
खुशवंत सिंहजी का आलेख पढ़ा, जिसमें उन्होंने फांसी की सजा को खत्म करने की वकालत की है। लेकिन मेरे कुछ सवाल हैं, जो फांसी की मुखालफत करने वाले तमाम लोगों से हैं। ऐसे लोग मुझे सिर्फ एक रास्ता बताएं कि कसाब, दाऊद, अफजल गुरु और हाफिज सईद जैसे लोगों का मन आप कैसे बदल सकते हैं या उनके भीतर के अपराधी को कैसे मार सकते हैं? आप कैसे यह सुनिश्चित करते हैं कि वे दोबारा अपराध में शामिल नहीं होंगे? बहुत से लोग यह कहते हुए मिल जाते हैं कि ‘अपराध को मारो, अपराधी को नहीं,’ पर कोई भी ऐसा करने का तरीका नहीं बता पता। कोई भी सजा समाज में व्यवस्था स्थापित करने के लिए ही होती है। वरना पुलिस-अदालतों की जरूरत ही क्या थी?
निमेश कुमार, अचपल गढ़ी, पिलखुवा

वोट दिया, विकास चाहिए
उत्तर प्रदेश में सत्ता की चाभी समाजवादी पार्टी के हाथों में सौंप दी गई है। मंत्रिमंडल भी गठित हो चुका है। अब बारी है जनता के फैसले पर सत्तारूढ़ दल के खरा उतरने की। इस चुनाव में युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। उम्मीदों के मुताबिक सूबे को युवा मुखिया भी मिल गया है। अब प्रदेश के युवा अपने मुख्यमंत्री को काम करते देखना चाहते हैं। आज का युवा जागरूक है और वह अपने आप को विकास की बुलंदी पर देखना चाहता है। समाजवादी पार्टी की छवि पूर्व में अच्छी नहीं रही है। इसलिए अखिलेश यादव पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई है। उन्हें न सिर्फ उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाना होगा, बल्कि अपनी पार्टी को नई प्रतिष्ठा भी दिलानी होगी। ये दोनों ही काम आसान नहीं हैं। 
खादिम अब्बास रिजवी, पूर्वाचल विश्वविद्यालय, जौनपुर

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