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गढ़वा में बढ़ रहा है पहलवानी का क्रेज

गरीबी और पिछड़ेपन से जंग में पहलवानी के दांव-पेच भी काम आ रहे हैं। जिले की युवा पीढ़ी में पहलवानी का क्रेज बढ़ रहा है। खास बात यह है कि इस दौड़ में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं। मेराल प्रखंड के सुदूरवर्ती और आदिम जनजातीय बहुल कुसमही की रहने वाली 18 साल की अनिता कुमारी इंटर आर्ट्स की छात्र है।

पढ़ाई के साथ-साथ वह अखाड़े में पहलवानी के दांव-पेंच में भी वह महारत हासिल करने में जुटी है। अपने सपनों के बारे में बताते हुए वह गुनगुना उठती है, दिल है छोटा सा/छोटी से आशा/आसमां में उड़ने की आशा। अनिता बताती है, मां और पिताजी मजदूरी कर घर खर्च का बमुश्किल जुगाड़ करते हैं। गरीबी में पली-बढ़ी। पढ़ने की इच्छा थी, तो गढ़वा आ गई।

आदिवासी छात्रवास में रहकर पढ़ाई के साथ-साथ कुश्ती भी सीखने लगी। अनिता झारखंड के अलावा हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और गुजरात आदि राज्यों में कुश्ती स्पर्धाओं में पदक जीत चुकी है। राज्य सरकार से बेहतर प्रदर्शन के लिए 36 हजार रुपए की राशि भी बतौर पुरस्कार मिले हैं। उसका सपना अब ओलिंपिक खेलने का है।

गढ़वा कुश्ती संघ के अखाड़े में अभ्यास के लिए पहुंचा 12 साल का साजन कुमार भी पहलवान बनने की तैयारी कर रहा है। खेल कोटे से विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी और कुश्ती के मुकाबलों की इनामी राशि लोगों को आकर्षित कर रही है।  साजन बताता है, पिता नहीं रहे। मां ईंट भट्ठे में काम कर गुजारा करती है। कुश्ती संघ के लोगों की मदद से वह कुश्ती के दांव सीख रहा है।

इसे सूखाग्रस्त जिले में गरीबी और कुपोषण आम है। इसके बावजूद कुश्ती के क्षेत्र में यहां के पहलवान तेजी से उभर रहे हैं। अनिता और साजन जैसे 50 युवाओं गढ़वा कुश्ती संघ प्रशिक्षित कर रहा है।  इनमें से ज्यादातर गरीब घरों के हैं।

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