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रेडियो एक्टिव किरणों की वजह से जीवन खतरे में

पनकी और पारीछा (झांसी) के थर्मल पावर हाउसों में जलने वाला कोयला रेडियो एक्टिव किरणें पैदा कर रहा है। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के बाद भारत सरकार ने इनके लिए धुला कोयला प्रयोग करने के निर्देश जारी किए थे पर आज भी दोनों में 40 फीसदी राख वाला कोयला प्रयोग हो रहा है। पावर हाउसों से निकलने वाली फ्लाई ऐश से टीबी, दमा के खतरे तो लोगों को पता था लेकिन भाभा सेंटर की यह रिपोर्ट नए खतरों का संकेत है। 

पनकी पावर हाइस से निकलने वाली फ्लाई ऐश से एक लाख की आबादी बुरी तरह प्रभावित है। अस्थमा, दमा, टीबी जैसी बीमारियों के साथ आम जीवन पर भी यह सीधा असर डाल रही है। लोग न तो छतों पर सो सकते हैं और न छतों पर कपड़े सुखा सकते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि राख के कण धूल कणों से कई गुना घातक हैं। अब भाभा सेंटर की रिपोर्ट ने नया खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार कोयले की धूल, उसके कण और फ्लाई ऐश (राख) को विभिन्न थर्मल पावर हाउसों से एकत्र कर उसका गामा स्पेक्ट्रोमेट्री विश्लेषण करने से पाया गया कि उसमें काफी मात्र में घातक विकिरण सामग्री मौजूद है। इस रिपोर्ट के बाद आजादनगर, कानपुर निवासी आशु गर्ग ने आरटीआई में सरकार से इसके बारे में जानकारी मांगी तो बताया गया कि उसके पास कोयला धोकर इस्तेमाल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। भारत सरकार ने पूरे देश के थर्मल पावर हाउस को इसके लिए निर्देश भी जारी कर दिए, लेकिन ये पावर हाउस आज भी वही कोयला इस्तेमाल कर रहे हैं और लाखों लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं।

- पनकी पावर हाउस में प्रयोग होने वाले कोयले में 35 से 40 फीसदी तक राख होती है। भारत सरकार के सकरुलर के बाद पावर हाउस को धुला कोयला प्रयोग करने के लिए पत्र लिखा गया था, लेकिन अभी वैसा ही कोयला प्रयोग हो रहा है। धुले कोयले में 15 से 20 फीसदी राख रह जाती है।-राधेश्याम, क्षेत्रीय अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

- हमारे यहां प्रयोग होने वाले कोयले में राख की मात्र 30 से 35 फीसदी तक होती है। कोयले के लिए समझौता मुख्यालय से कोयला मंत्रलय के बीच होता है। जो कोयला मिलता है हम उसी का प्रयोग करते हैं। हालांकि कोयला धोने से इतनी राख कम होगी समझ से परे है।-मुरलीधर भागचन्दानी, जीएम पनकी पावर हाउस

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