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जीवन में नई शुरुआत का दिन

साखी सर्दी के अंत और वसंत के आगमन का शुभ प्रतीक है। इस ऋतु में किसान नई उपज को काटते हैं। आकाश में नए प्रकाश की आभा दिखाई देती है। चारों ओर वृक्षों पर नए-नए फूल खिलते हैं। उनसेनिकलने वाली सुगंध से सारे वातावरण में उल्लास छा जाता है। सारा वातावरण आनन्द से नाच उठता है। यदि हम इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह समय प्रभु के मिलन का समय है। ईश्वर हमारा प्रेमी है और हम आत्माएं उसकी आशिक हैं। वसंत ऋतु हमें बतलाती है कि प्रभु का साक्षात्कार हमें एक विचित्र अनुभव करवाता है। जब हम प्रभु से मिलते हैं तो उस समय हमें एक विशेष प्रकार की अनुभूति और उल्लास होता है।

बैसाखी का दिन नए साल की शुरुआत का दिन है। इस दिन हमें पुरानी गलतियों को भूल कर नए जीवन का आरम्भ करना चाहिए। बैसाखी के दिन हमारी नई जिन्दगी का आरंभ होना चाहिए। दिल से सब फर्क मिट जाने चाहिए। प्रकृति के लिहाज से इस महीने पेड़-पौधों में नई कोपलें निकलनी शुरू हो जाती हैं। इनमें एक नई जिन्दगी की शुरुआत होती है तो हमें भी इस दिन कुछ नया सबक लेना चाहिए, जिससे हमारे जीवन में नई कोपलें फूटें। 

जब-जब महापुरुष इस दुनिया में आते हैं, वे एक ही बात को बार-बार पेश करते हैं कि मानुष जन्म बड़े भागों से मिलता है। इसमें हम अपने घर वापस जा सकते हैं। परमात्मा महाचेतना का सागर है और आत्मा उसकी बूंद है। परमात्मा प्रेम है और आत्मा की जात भी प्रेम है। इसमें कुदरती तौर से प्रभु से मिलने का भाव है। इसका गुण है अपने प्रीतम से जुड़ना।
बैसाख धीरन क्यों वाढियां जिना प्रेम बिछोह।
‘बैसाख धीरन क्यों’ बैसाख का महीना आ गया है। तुम्हारी फसल कटी पड़ी है और तुम प्रभु से दूर पड़े हो। उसके बगैर तुम्हें धीरज कैसे आ सकता है? तुम कैसे जीवन गुजार रहे हो? तुम उसे कैसे भूल गए?
हर साजन पुरख विसार के लगी माया धोह।

हम परमात्मा से दूर हो गए, उसे भूल गए और माया हाथ धोकर हमारे पीछे लग गई। माया नाम है भूल का। यह भूल कहां से शुरू हुई? यह दर्द भरी कहानी है। फसल तो बाहर कटी पड़ी है। महात्मा देखकर कहते हैं, ‘‘तुम उस प्रभु से कटे पड़े हो। तुम जिसका अंश हो, उसे ही भूल गए। यह भूलना ही सब खराबियों की जड़ है। तुम प्रभु को भूल कर अपना जन्म बर्बाद कर रहे हो।’’ ‘प्रभु बिना अवर न कोय’, प्रभु के बिना तुम्हारी आत्मा का कोई साथी नहीं। स्त्री, बच्चे ये सब प्रारब्ध कर्मो के अनुसार प्रभु ने जोड़े हैं। खुशी से लेना-देना निभाओ और अपने घर जाओ। वह परमात्मा जो हमारी आत्मा का संगी-साथी है। वह तुम्हारे साथ जाएगा। हमें यह मानुष जन्म प्रभु को पाने के लिए मिला है।

आत्मा चेतना स्वरूप है, जब तक यह प्रभु से नहीं मिलेगी, उसकी संतुष्टि नहीं होगी। मन तब तक काबू में नहीं आएगा, जब तक कि वह परिपूर्ण परमात्मा से नहीं मिलेगा। ‘नाम मिले मन तृप्तिये’। भगवान कृष्ण के जीवन की घटना है। उन्होंने गेंद लाने के लिए यमुना में छलांग मारी। नीचे हजार मुंह वाला सांप था। उन्होंने बांसुरी बजाते हुए उसको नाथ दिया। यह सांप कौन था? यह सांप और कोई नहीं मन ही है, इसे ही जीतना है। ‘मन जीते जग जीत’। हमारे और उस प्रभु की प्राप्ति के बीच कोई रुकावट है तो वह मन ही है। अगर तुम अपने दिल में प्रभु को पाने का पक्का इरादा रखते हो तो एक कदम अपने मन पर रखो अर्थात् इसे खड़ा करो, दूसरा कदम जो तुम उठाओगे, प्रभु की गली में पहुंच जाएगा।

बैसाख का महीना तभी सफल होगा, जब नई जिन्दगी का आरंभ होगा। यह नई जिन्दगी तब मिलती है, जब इनसान को पूर्ण गुरु का साथ मिलता है। गुरु के मिलने के बाद ही इनसान में प्रेम भक्ति जागती है और वह मालिक की दरगाह में शोभा पाता है। इसके बाद दुनियावी माया का जहर उस पर असर नहीं करता और उसे सुखों का समुद्र मिल जाता है। वह महीना, वही दिन, वही मुहुर्त अच्छा है, जिसमें हमने उस प्रभु को पा लिया।

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  • Web Title:जीवन में नई शुरुआत का दिन