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‘प्राणिमात्र से समान व्यवहार करें, किसी में दोष न देखें’

महाप्रभु वल्लभाचार्य को पुष्टि मार्ग में भगवान श्रीकृष्ण का ‘मुखावतार’ माना जाता है। महाप्रभु के पूर्वज दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश आकुवीडु जनपदांतर्गत कौकरबल्लि स्थान के निवासी थे। इनके पिता लक्ष्मण भट्ट वहां से काशी आकर बस गए थे। इनका जन्म वैशाख कृष्ण एकादशी संवत 1533 (सन् 1476) को हुआ। पांच वर्ष की आयु में बालक वल्लभ को अपने पिता से गायत्री मंत्र मिला। उसी वर्ष काशी के प्रकांड विद्वान माधवानंद तीर्थ त्रिदंडी जी से विद्याध्ययन शुरू किया। शिक्षा के बाद युवा वल्लभाचार्य ने प्रयाग में गंगा पार डेल ग्राम को अपना स्थायी निवास बनाया। यहीं महाप्रभु से मिलने महाप्रभु चैतन्य पधारे थे। यहां से उन्होंने अपने विचारों के प्रसार के लिए तीन बार पूरे देश का भ्रमण किया। जहां-जहां उन्होंने प्रवचन दिए और कुछ दिन ठहरे, वे स्थान 84 हैं। बाद में ये ही स्थान चौरासी बैठकों के रूप में जाने गए। ये बैठकें कश्मीर से कन्याकुमारी और द्वारका से जगन्नाथ पुरी तक विद्यमान हैं।

आचार्य श्री वल्लभ एक सामाजिक चेतना संपन्न धर्माचार्य थे। अपने जीवन के आरंभिक काल में ही उन्होंने समाज की स्थिति को भली-भांति देख और समझ लिया था। इन्होंने प्रत्येक व्यक्ति के लिए छ: बातों (सिद्धांतों) को अनिवार्य बताया, जिससे मानव जीवन सफल एवं सार्थक सिद्ध हो सके। 1. यथाशक्ति स्वधर्म का आचरण करना 2. विधर्म से बचते रहना 3. इंद्रियों रूपी घोड़ों पर नियंत्रण रखना 4. सब में भगवान श्रीकृष्ण हैं, यह भावना रखते हुए सहनशीलता रखना 5. वैराग्य भावना रखना और 6. हर स्थिति में पूरी तरह संतुष्ट रहना। वल्लभ संप्रदाय में गो सेवा का विशेष महत्त्व है।

श्रीकृष्ण भक्ति में आचार्य वल्लभ की प्रगाढ़ आस्था थी। उनके मन में यह तड़प थी कि जल्दी-से-जल्दी श्रीकृष्ण की लीला भूमि ब्रजमंडल के दर्शन किए जाएं। अपनी माताजी से स्वीकृति प्राप्त कर वे ब्रजभूमि की ओर चल दिए। यहां यमुना घाट पर शमी (छोंकर) वृक्ष के नीचे आसन लगाया और फलाहार करते हुए ‘अष्टाक्षर मंत्र’ का जाप करने लगे। कहा जाता है श्री यमुनाजी के प्रबल वेग के बीच श्रवण सुदी एकादशी की मध्य रात्रि को श्रीकृष्ण यमुनारानी के साथ प्रकट हुए। आचार्य वल्लभ स्वामिनि सहित पूर्ण पुरुषोत्तम के दर्शन करके धन्य हो गए। सूत के कच्चे धागों की माला ठाकुर को पहनाई, रोली का तिलक किया और मिश्री भोग में रखी। इसी घटना की स्मृति में आज भी वल्लभ संप्रदाय में पवित्र एकादशी मनाई जाती है, जो यह संकेत देती है कि संसार के कच्चे रिश्ते-नातों को प्रभु चरणों में समर्पित करने में ही जीव का कल्याण होता है।

आचार्य वल्लभ ने अपने श्री ठाकुरजी से अनुमति प्राप्त कर समर्पण मंत्र द्वारा 84 भक्तों को दीक्षा दी, जो आज भी 84 वैष्णवों के नाम से विख्यात है। अपने भक्ति सिद्धांत प्रतिपादन के लिए आचार्य ने पुष्टि मार्ग नामक एक भक्ति मार्ग की स्थापना की। यह भक्ति मार्ग भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह को भी सर्वश्रेष्ठ और भजनीय मानता है। पुष्टि शब्द का अर्थ ही है ‘पोषण’ अर्थात् भगवदनुग्रह ही है। भगवान की कृपा प्राप्ति ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए। भगवद्कृपा से मनुष्य की समस्त इच्छा, आकांक्षा पूर्ण हो जाती है। आचार्य ने पुष्टि मार्ग की स्थापना के साथ ही अपने संप्रदाय का सिद्धांत, शुद्धाद्वैत नाम से प्रस्तुत किया। वल्लभाचार्य बालरूप श्रीकृष्ण की सेवा करते थे। पुष्टि मार्ग की प्रेरणा से ही अष्टछाप के कवियों (आचार्य वल्लभ के चार शिष्य कुंभनदास, सूरदास, कृष्णदास और परमानंद दास) और उनके सुपुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ के चार शिष्यों—गोविंद स्वामी, छीत स्वामी, चतुभरुजदास और नंददास) ने मध्यकाल के हिंदी साहित्य को एक नया मोड़ दिया।

अपने बावनवे वर्ष में ईश्वर के मौन संकेत का जब उन्हें आभास हुआ कि उनका इस धरती पर काम पूरा हुआ तो उन्होंने अपने दोनों पुत्रों—गोपीनाथजी और विट्ठलनाथजी को बुलाकर अंतिम उपदेश दिया और संवत 1587 (सन् 1528) में काशी के हनुमान घाट पर सदेह गंगा में प्रवेश कर गए। जितना अद्भुत प्राक्ट्य था, उतनी ही अलौकिक उनकी परलोक गमन लीला थी। आचार्य वल्लभ ने समाज में प्राणिमात्र से समान व्यवहार करने, किसी में दोष न देखने, गुण ग्राह्यता, धर्मनिष्ठता, भीषण आपत्तियों अथवा महाहर्ष के उपस्थित होने पर भी शांतचित्त रहने, काम-लोभ रहित निस्पृह, विरक्त तथा श्रीकृष्ण सेवा का उपदेश दिया। इस प्रकार आचार्यश्री ने भारतीय तत्व दर्शन को समग्र दृष्टि दी। भारतीय धर्म साधना को नया आयाम प्रदान किया। परंपरागत वैष्णव धर्म को अभिनव चेतना प्रदान की और कृष्ण भक्ति धारा को अपूर्व स्वरूप दिया।

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