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भारत-पाक रिश्तों के अगर मगर

पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की निजी भारत यात्रा ने लोगों के दिमाग पर अच्छी छाप छोड़ी है। वैसे जब से वह पाकिस्तान की सत्ता में आए हैं, भारत के बारे में उन्होंने हमेशा अच्छी बातें ही कही हैं। शुरू में तो उन्होंने यह तक कहा था कि हमें कश्मीर मसले को बैक-बर्नर पर रख देना (ज्यादा तूल नहीं देनी) चाहिए। इस पर पाकिस्तान में खासा हंगामा हुआ था। अब देखना यह है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके पाकिस्तान आमंत्रण को किस तरह लिया जाता है।

इसके लिए उन्हें विपक्षी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग और उसके नेता नवाज शरीफ की तरफ से तो कोई परेशानी पेश नहीं आएगी। अक्सर कहा जाता है कि नवाज शरीफ की पार्टी के कट्टरपंथियों से संदेहास्पद रिश्ते हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। एक तो ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। नवाज शरीफ पूरी तरह भारत विरोधी नहीं हैं। दूसरे कट्टरपंथियों के विपरीत वह लोकतंत्र समर्थक हैं। और उनके पिछले जो राजनीतिक अनुभव हैं, उन अनुभवों ने नवाज शरीफ को फौजी दबदबे का विरोधी बना दिया है। वह जब सत्ता में थे, तो फौज पर नकेल कसने की उन्होंने गंभीर कोशिशें की थीं। भारत के साथ व्यापार बढ़ाने की कोशिशों का भी वह हमेशा से स्वागत करते रहे हैं। नवाज शरीफ खुद एक उद्योगपति हैं और व्यापार का अर्थ और फायदा वह अच्छी तरह समझते हैं। इस लिहाज से भारत से दोस्ती की कोशिशों का विरोध या तो वहां के सत्ताधारी गठजोड़ में ज्यादा होगा, या वहां के कट्टरपंथी ज्यादा करेंगे।

राष्ट्रपति जरदारी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पाकिस्तान यात्रा का निमंत्रण दिया है, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया है। इसके बाद से ये अटकलें भी लगने लगी हैं कि मनमोहन सिंह पाकिस्तान कब जाएंगे या उन्हें कब जाना चाहिए। काफी समय से भारत के शीर्ष नेता पाकिस्तान नहीं गए। तकरीबन 13 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान यात्रा की थी। वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा का समय महत्वपूर्ण था, क्योंकि तब वहां का नागरिक प्रशासन मजबूत स्थिति में था। लेकिन आज यह बात उस तरह से नहीं कही जा सकती। एक तो वहां राजनीतिक अनिश्चितता है और फिर मध्यावधि चुनावों की अटकलें भी। फिर कई बड़े राजनीतिक मामले इस समय पाकिस्तान की शीर्ष अदालत में चल रहे हैं।

पिछले कुछ समय से यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में भारत के बारे में आम राय काफी बदल चुकी है। दरअसल, इस बदलाव को भी सही संदर्भ में समझना होगा। पाकिस्तान में इस समय जो हालात हैं, उनमें लोगों ने अमेरिका को अपना दुश्मन नंबर एक मानना शुरू कर दिया है। बस यही फर्क है कि अब हम दुश्मन नंबर एक नहीं हैं। इसलिए यह देखना होगा कि भारतीय प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा से वहां की सत्ताधारी पार्टी को कोई राजनीतिक फायदा मिल सकता है या नहीं। अगर जवाब हां होता है, तो यह एक वाकई बड़ा बदलाव है।

भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने के मामले पर इन दिनों पाकिस्तान में काफी चर्चा हो रही है। यह पूछा जा रहा है कि हम भारत को तरजीही मुल्क का दर्जा क्यों दें? हालांकि यहां समस्या तर्जुमे को लेकर ज्यादा है, क्योंकि इसमें तरजीह देने जैसा कुछ भी नहीं है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि व्यापार में आपके साथ भेदभाव नहीं होगा। या दूसरे शब्दों में यह कि व्यापार के मामले में हम आपसे उतना ही प्यार करेंगे, जितना दूसरे मुलकों के साथ करते हैं। लेकिन मामला तजरुमे में फंसा है। जमीनी हालात ये हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार के कई प्रस्ताव अभी तक अटके हुए हैं।

हाल ही में पाकिस्तान के एक जर्नल में एक लेख छपा है। यह भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे नदी जल विवाद पर है, जो इस समय आरबिट्रेशन यानी मध्यस्थता के हवाले है। लेख में कहा गया है कि अगर आरबिट्रेशन में फैसला हमारे हक में नहीं आता, तो हमें दूसरा रास्ता अपनाना होगा। एक तरफ हालत यह है कि आप नदियों के पानी के मामले में भी आरबिट्रेशन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, ऐसे में यह उम्मीद भी कैसे की जाए कि बाकी मसले आसानी से सुलझ जाएंगे?

अगर भारत के हिसाब से सोचें, तो भारतीय प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा अगर फायदा देती नहीं दिखती, तो भारत की घरेलू राजनीति में उस पर सवाल उठेंगे ही। ऐसा तो हो नहीं सकता कि प्रधानमंत्री वहां जाएं और खाली हाथ लौट आएं। उनकी यात्रा से कुछ नतीजे तो निकलने ही चाहिए। प्रधानमंत्री अगर वहां जाएं, तो कोई न कोई बड़ी उपलब्धि तो हाथ लगे। कम से कम आतंकवाद के खिलाफ ही कोई ठोस कामयाबी मिलनी चाहिए। खासतौर पर तब, जब चीन भी आतंकवाद के मामले पर पाकिस्तान की ओर उंगली उठा रहा है। यह उम्मीद तो हर हाल में की ही जाएगी कि भारतीय प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा तभी होनी चाहिए, जब वह किन्हीं ठोस नतीजों पर पहुंचती दिखाई दे।

भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बहुत नाजुक हैं और हमेशा ही इनसे एक से ज्यादा मुद्दे जुड़े रहते हैं। यह ऐसी स्थिति है कि जिसमें अगर आप आगे नहीं बढ़ रहे हैं, तो इसका यही अर्थ लगाया जाएगा कि आप पीछे जा रहे हैं।  माना जा रहा है कि अब जो कुछ भी होगा, वह  छह महीने के अंदर ही होगा। लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच छह महीने का समय बहुत लंबा अंतराल होता है। एक छोटी-सी घटना ही सारे समीकरण बदल सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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