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ताकि पूरे हिमालय की सुध ली जा सके

मौसम बदलता है, तो हमें हिमालय की याद आती है। कभी हम उसे सामरिक सोच के कारण महत्व देने लगते हैं, तो कभी-कभार उसके पर्यावरण की चिंता भी हम कर लेते हैं। लेकिन हिमालय सिर्फ इतना नहीं है। हिमालय की पर्वत मालाओं में विश्व के अन्य पर्वतों की अपेक्षा सबसे अधिक सघन आबादी है। वहां सिर्फ लोग रहते ही नहीं, अपनी रोजी-रोटी भी कमाते हैं। फिर वहां पर्यावरण, जंगल और जीव हैं, जो अजूबा भी हैं और महत्वपूर्ण भी। हिमालय की गतिविधियां इस क्षेत्र के साथ देश के बहुत से मैदानी भाग को प्रभावित करती हैं। हमारी बहुत सारी नदियां इन्हीं पर्वतों से निकलती हैं। देश में सूखा होगा या प्रकृति मेहरबान होगी, यह काफी हद तक हिमालय पर निर्भर करता है। हिमालय में बेशुमार खनिज भी हैं और कई अन्य प्राकृतिक संसाधन भी।

इसीलिए हिमालय को लेकर चिंता अक्सर पूरे देश में दिखाई देती है। कभी इसके ग्लेशियरों के घटते आकार को लेकर। कभी इसकी नदियों पर बन रहे बड़े बांधों के खतरों को लेकर। कभी उन सड़कों को लेकर, जो पर्यटकों से भरी गाड़िया वहां ले जाकर संवेदनशील पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं। इन चिंताओं की प्रतिध्वनि कभी-कभी सरकार की नीतियों में भी सुनाई देती है। समस्या यह है कि जिस तरह ये चिंताएं अलग-अलग हैं, उसी तरह नीतियां भी भिन्न-भिन्न बनती-बिगड़ती हैं। विकास के लिए बनी नीति में पर्यावरण की चिंता नहीं दिखाई देती, तो पर्यावरण के लिए बनी नीति में अक्सर यह नहीं सोचा जाता कि इसका यहां रहने वालों की रोजी-रोटी पर क्या असर होगा। हम समस्याओं को अलग-अलग करके देखते हैं और हमारी नीतियों में समग्र हिमालय की सोच कहीं नहीं दिखती।

पूरा हिमालय कई प्रदेशों में बंटा हुआ है, लेकिन हर जगह चिंताएं समान हैं। बहुत सी समस्याएं तो जैसी कश्मीर में हैं, वैसी ही उत्तराखंड में भी हैं और सिक्कम में भी। यह सब यही बताता है कि हिमालय के लिए एक समग्र नीति की जरूरत है। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि पूरे हिमालय में जगह-जगह स्थानीय आबादी की जो कोशिशें हो रही हैं, उन्हें भी इस नीति में शामिल किया जाए। कभी सुंदरलाल बहुगुणा व उनके साथियों ने कश्मीर से कोहिमा तक बहुत लंबी पदयात्रा का आयोजन किया था, जिसके दौरान कितने ही गांववासियों से नजदीकी विमर्श हुआ। उत्तराखंड के स्तर पर अस्कोट से आराकोट जैसी कई यात्राएं हुईं। ‘पहाड़’ जैसे अध्ययन-प्रयासों ने जनता की सोच को उभारने वाले दस्तावेज तैयार किए। ‘बीज बचाओ आंदोलन’ ने पर्वतीय कृषि विरासत के प्रति नई पीढ़ी को सचेत किया। इन सब को शामिल करके ही हम एक समग्र हिमालय नीति बना सकते हैं। यह पूरे देश के लिए तो जरूरी है ही, साथ ही हिमालय में बसने वालों के असंतोष को थामने के लिए भी आवश्यक है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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