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अहा! छुट्टी-मय देश हमारा

झुंझलाए हुए थे वह। सरकारी बैंक और दफ्तर फिर बंद। झुंझलाहट को पतला करने की नीयत से मैं बोला, छुट्टियां तो आपके जमाने में भी होती थीं, लेकिन तब न भारत उदय हुआ था, न ही महान। जब लगातार तीन-चार दिन सरकारी दफ्तरों और बैंकों में काम बंद होता है, तो समझ में आता है कि हमारे देश के महान होने की एक वजह भरपूर छुट्टियां भी हैं। कोई धर्म-पारायण भारतीय नारी भी इतने व्रत-उपवास नहीं रखती होगी, जितने दिन इस देश के बैंक व कार्यालय बंद रहते हैं। हक्सले साहब इस दौरान भारत भ्रमण करते, तो संपेरो-बाजीगरों की बजाय उनको छुट्टियों वाला देश नजर आता इंडिया। ट्वंटी फोर बाई सेवेन टाइप व्यस्त नर-नारी भला क्या जाने छुट्टियों का स्वाद।

नॉर्मल होने पर उन्हें याद आया कि देश के पहले प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया था कि- आराम हराम है। कालांतर में उनके नाती की अनुकंपा से फाइव डेज का वीक चालू होते ही आराम ही आराम हो गया। अब फ्राइडे को प्रौढ़ दिखते बंदे/ बंदियां मंडे को फ्रेश नजर आते हैं। सैटरडे-संडे मसाज और खिजाब हेतु ‘फुर्सत के रात दिन..।’ जहां पांच दिनों के कार्य-दिवस वालों को सालाना छुट्टियों की लिस्ट में मंडे, फ्राइडे को पड़ने वाली छुट्टी अतिरिक्त खुशी देती है,वहीं सैटरडे-संडे से टकराते तीज-त्योहार खीझ पैदा करते हैं..मारी गई एक छुट्टी। सिर्फ गुड- फ्राइडे ही कभी संडे को नहीं पड़ता!

दुख-सुख का भेद नहीं करती सरकारी छुट्टियां। किसी ‘महान’ हस्ती के शरीरांत के साथ-साथ देश के बैंक, सरकारी कार्यालयों की हृदयगति भी रुक जाती है। सारा सदमा सरकारी इमारतें और ‘पचास प्रतिशत विनीत’ राष्ट्रध्वज ङोलता है। कर्मठ महापुरुषों के नाम पर छुट्टियां घोषित करना राज्य सरकारों की मजबूरी। संपूर्ण धार्मिकता के साथ एक वर्ष में छह महीने छुट्टी में ही बिता सकता है गौरमेंट सरवेंट। छुट्टियों की यह शंखपुष्पी दिमाग को इतना बलिष्ठऔर ठस कर देती है कि दफ्तोरियल एंग्जाइटी ग्रसित नहीं करती। शेष छह महीने एकदम निष्काम भाव में गुजारे जा सकते हैं। वास्तविकता यह है कि अजगर और पंछी के समान सरकारी कर्मचारियों के दाता भी राम ही हैं।

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