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सुस्त इंसाफ

सन 2002 के गुजरात दंगों के एक और प्रकरण में अदालत का फैसला आया है, जिसमें 23 लोगों को दोषी करार दिया गया है। आणंद की सेशन अदालत ने ओड़ गांव में हुए हत्याकांड में यह फैसला सुनाया है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के 23 लोगों की हत्या कर दी गई थी। इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। पहले यह मामला स्थानीय पुलिस के पास था, बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल ने इस मामले की जांच की। 2009 में यह मामला अदालत में पेश हुआ और अब जाकर इसका फैसला हुआ। साल 2002 में गुजरात में जो दंगे हुए थे, उनके पीछे राजनीतिक ताकतें सक्रिय थीं और उनकी यह कोशिश भी रही कि अपराधियों को सजा न होने पाए। स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व भी इन मामलों की जांच में दिक्कतें पैदा करता रहा है। इसी का नतीजा यह मानना चाहिए कि अब तक सिर्फ तीन मामलों में अदालत का फैसला आया है। इनमें से एक मामला तो गोधरा में रेल बॉगी जलाने का था, जहां से गुजरात दंगों की शुरुआत हुई और एक मामला मेहसाणा जिले के सरदारपुरा गांव का है। गुजरात दंगों की जांच के सिलसिले में अगर इतनी तरक्की हुई है, तो वह समाज के धर्मनिरपेक्ष और उदार तबकों के दबाव तथा सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही मुमकिन हुई है, लेकिन न्याय की रफ्तार यह संतोष नहीं दे सकती कि दंगों के अपराधियों को आखिरकार कानून के हाथों सजा मिली और दंगे के पीड़ितों को इंसाफ मिला। अगर कुछ संतोष की बात है, तो यही कि दंगों के अपराधी इन मामलों को रफा-दफा करने में कामयाब नहीं हुए और इंसाफ की तलवार उन पर लटक रही है। इस तरह के अपराधी इसी वजह से ऐसे जघन्य अपराध करने का दुस्साहस करते हैं कि वे न्यायिक प्रक्रिया में इतनी देरी करवा सकते हैं कि न्याय का कोई मतलब न रह जाए।

हर समाज में अपराध होते हैं और कई समाजों में अलग-अलग समूहों में नफरत या अविश्वास भी हो सकता है। जरूरी यह है कि अगर इस नफरत या अविश्वास की परिणति सामूहिक हिंसा में हो, तो समाज का नेतृत्व और उदार तबके नफरत की जड़ों तक जाकर उसे दूर करने के उपाय करें। सांप्रदायिक या नस्लवादी दंगों के पीछे जो निहित स्वार्थ या निमरूल पूर्वाग्रह होते हैं, उनकी पहचान करके उन्हें दूर करना जरूरी होता है, वरना ऐसे दंगे स्थायी रूप से नफरत और हिंसा की जड़ें जमा देते हैं। गुजरात में भले ही 2002 के बाद दंगे नहीं हुए, लेकिन पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा या आतंकवाद की घटनाओं के पीछे 2002 की छाया मौजूद रही है। चाहे बहुसंख्यक हिंदू समाज हो या अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज, अगर वह नफरत और अविश्वास को अपने अंदर पालता रहेगा, तो फिर कभी कहीं भी हिंसा का विस्फोट हो सकता है। गुजरात के दंगों के जख्म भरने या उनके पीछे के समाजशास्त्रीय या आर्थिक कारणों का विश्लेषण करके उन्हें दूर करने की प्रक्रिया तब तक कामयाब नहीं  हो सकती, जब तक न्यायिक प्रक्रिया में लोगों का भरोसा नहीं मजबूत होता। न्याय की धीमी प्रक्रिया जख्म भरने की कोशिशों को कामयाब नहीं होने देगी। जब तक न्यायिक प्रक्रिया तेज और प्रभावी नहीं होगी, तब तक राजनीति में मौजूद स्वार्थी तत्व सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल सियासी हथियार की तरह करने से बाज नहीं आएंगे। इक्कीसवीं सदी के भारत में सांप्रदायिक नफरत की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह तभी संभव है, जब नफरत फैलाने वालों को तुरंत सजा मिले। साथ ही समाज की सोच बदलने वाली ताकतें और संस्थाएं भी सक्रिय हों, जो नफरत को जड़ से मिटाने में सहयोग करें।

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