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एक ‘जाती’ दौरा

सदर आसिफ अली जरदारी एक दिन के भारत दौरे पर गए, लेकिन उनके कुनबे में शामिल लोगों की तादाद और उन्हें हिन्दुस्तान ले जाने व वापस लाने पर सरकारी खजाने से खर्च हुई रकम को देखें, तो यकीनन ‘जाती’ अल्फाज के लिए हमें नई परिभाषा गढ़नी पड़ेगी। अलबत्ता, हिन्दुस्तान के वजीर-ए-आजम मनमोहन सिंह ने सदर को पूरी इज्जत बख्शी और दोनों नेताओं ने चालीस मिनट तक एक-दूसरे से बातचीत की। दोनों नेता अखबार नवीसों से मुखातिब भी हुए, जिससे हमें मालूम हुआ कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘उचित तारीख देख’ पाकिस्तान आने का न्यौता कुबूल कर लिया है। दोनों मुस्कुराए, हाथ मिलाया और भारत-पाक रिश्तों के बीच जमी बर्फ एक-दो डिग्री पिघल गई। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि दोनों ने वाकई क्या बात की, लेकिन कहा गया है कि दोनों की बात काफी अच्छी रही और इससे दोनों शख्सीयतों को एक-दूसरे के सामने अपनी बेबाक राय रखने का मौका मिला। बहरहाल, पड़ोसी मुल्क के इस ‘निजी दौरे’की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि सदर की टीम में विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार शामिल नहीं थीं। मुमकिन है कि उनकी कुछ और व्यस्तता रही हो। वैसे यह दौरा इस मायने में तो खास था ही कि पिछले सात साल में पहली बार  पाकिस्तानी सदर हिन्दुस्तान की यात्रा पर जा रहे थे। दोनों मुल्कों के लिए शिखर बैठक का आयोजन आसान नहीं है। इसलिए दोनों के रहनुमा वैश्विक सम्मेलनों के दरम्यान मिलते रहे हैं या फिर खेल- क्रिकेट कूटनीति के जरिये। हालांकि इस मर्तबा यह साफ नहीं किया गया था, पर सदर के इस दौरे से दोनों देशों के बीच भरोसा बहाल करने की कवायदों को ताकत तो मिली ही है। गौरतलब है कि पिछले साल से ही आपसी व्यापार के जरिये दोनों देश विश्वास बहाली की दिशा में काम कर रहे हैं। लेकिन सदर आसिफ अली जरदारी को यह समझने की जरूरत है कि अपने खानदान के 25 लोगों के साथ पीपीपी के मुखिया, गृह मंत्री, विदेश सचिव और हिफाजती अमले को सरकारी खर्च पर कहीं ले जाना ‘जाती’ दौरा नहीं हो सकता। यह तो सरासर सरकारी खजाने का दुरुपयोग है।
द न्यूज, पाकिस्तान

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